समुद्र के पुल पर लहरें पुकारती हैं
तट उन्हें स्नेह से प्रतीक्षा करता है
पानी और रेत के बीच अनकहे शब्द
चुपचाप प्रेम बनकर बहते हैं
आसमान नीचे देखकर मुस्कुराता है
तारे रात में धीरे से आँख झपकाते हैं
प्रकृति दूरियों को पास लाती है
स्नेह के रास्ते खोल देती है
पहाड़ शांति से खड़े रहते हैं
पेड़ प्रेम से पास आकर जुड़ जाते हैं
वियोग भूलकर प्रकृति कहती है
सबको जोड़ने वाला पुल है—प्रेम
जी आर कवियुर
22 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)
No comments:
Post a Comment