Monday, January 26, 2026

इस बहाव का अंत ( कविता )

इस बहाव का अंत ( कविता )

शहर की हलचल में अकेलापन  
तुम पास होने के बावजूद ऐसा क्यों?  
बिना जलाए भी दीपक जलता है  
पर तुम्हारा प्रकाश कहीं खो सा गया  

एक बार मुड़कर देखो तो भी  
जानने की चाह में सब कुछ गायब हो जाता है  
ज्ञान की गहराई को छूने की कोशिश में भी  
सच्चाई कहीं अनजानी रह जाती है  

अक्षरों के दर्द की कलम जब टूटती है  
तब, मौन में  
तुम — कविता बनकर जन्म लेते हो  

अंगुलियों की चोट में दर्द छुपा रहता है  
कविता, जब तुम्हारा हल्का दर्द महसूस होता है  
तभी समझ आता है  
वही सुख है  

पहाड़ से बहती झरने की तरह  
एकाएक शांत हो जाना  
मेरी लय वहीं थम गई।

जी आर कवियुर 
26 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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