एक नन्हा बच्चा बिना भोजन के प्रतीक्षा करता है
सड़कों के बच्चों की मुस्कान दूर होती जाती है
पुराने कपड़े मिट्टी से मिलने को तरसते पड़े हैं
आँसुओं में भीगे दुःख मौन में बोलते हैं
हाथ भोजन की एक बूँद के लिए फैलते हैं
साल भर प्रतीक्षित हवा भी सूनी लगती है
अभाव के बोझ से घर दम तोड़ते हैं
रोशनी से अनजान, अंधेरे में जीते हुए
नदी की बूँदें सपनों में बदल जाती हैं
गर्मियों की ठंडक भी राहत नहीं देती
ठंडी रातों में भूख अपनी लय चलाती है
दारिद्र्य हृदय पर अमिट निशान छोड़ जाता है
जी आर कवियुर
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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