Friday, January 9, 2026

दारिद्र्य

दारिद्र्य

एक नन्हा बच्चा बिना भोजन के प्रतीक्षा करता है  
सड़कों के बच्चों की मुस्कान दूर होती जाती है  
पुराने कपड़े मिट्टी से मिलने को तरसते पड़े हैं  
आँसुओं में भीगे दुःख मौन में बोलते हैं  

हाथ भोजन की एक बूँद के लिए फैलते हैं  
साल भर प्रतीक्षित हवा भी सूनी लगती है  
अभाव के बोझ से घर दम तोड़ते हैं  
रोशनी से अनजान, अंधेरे में जीते हुए  

नदी की बूँदें सपनों में बदल जाती हैं  
गर्मियों की ठंडक भी राहत नहीं देती  
ठंडी रातों में भूख अपनी लय चलाती है  
दारिद्र्य हृदय पर अमिट निशान छोड़ जाता है

जी आर कवियुर 
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)


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