तेरी इबादत में जो सुकूँ मिला, वो कहीं और नहीं
सज्दे में झुक कर समझा, तू मुझसे दूर नहीं
हर साँस में तेरा नाम, हर धड़कन तेरा ज़िक्र
मैं खुद को भूल भी जाऊँ, पर तुझे भूलूँ नहीं
मंदिर हो या मस्जिद, हर दर पे तू ही तू
पर्दे बहुत हैं लोगों में, पर तू कहीं छुपा नहीं
नफ़्स की धूप में जलकर, रूह ने ये जाना
जिसे मैं ढूँढता फिरा, वो मुझसे जुदा नहीं
इश्क़ की राह में जब खुद को मिटाया मैंने
तभी समझ आया कि यह सौदा कोई घाटा नहीं
जी आर कहे, मैं हूँ तो बस तेरी रहमत से
वरना इस ख़ाक में ऐसा कोई हुनर था नहीं
जी आर कवियुर
04 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)
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