नग्नता केवल वस्त्रों की कमी नहीं है
यह वह अवस्था है जहाँ छुपाने को कुछ नहीं बचता
गरीबी के सामने शरीर खुला खड़ा रहता है
सम्मान भी रक्षा नहीं कर पाता
आँखों में चुपचाप शर्म भर जाती है
ठंड से बचने को हाथ स्वयं को थाम लेते हैं
शब्द बाहर आने से डरते हैं
नज़रें सीधे दिल को भेद देती हैं
नग्न सत्य हर किसी को स्वीकार नहीं होता
समाज मुँह फेर लेता है
करुणा मौन बनकर खड़ी रहती है
और मनुष्य भीतर से टूट जाता है
जी आर कवियुर
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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