जब यह समझ आया कि छोड़ने को कुछ भी नहीं,
तो हर रास्ता अर्थपूर्ण लगने लगा।
हाथों में जो बंधा था वह बोझ नहीं था—
हर संबंध
पुण्य की मौन मुहर बन गया।
जीवन किसी लक्ष्य तक पहुँचने की दौड़ नहीं,
बल्कि धीरे-धीरे चलने वाली
पुण्य संचित करने की तीर्थयात्रा है।
वहाँ सफलता और असफलता
एक ही पथ की परछाइयाँ हैं,
और पीड़ा भी मार्गदर्शक बन जाती है।
हानियाँ शून्यता नहीं,
अंतरात्मा की ओर बुलावे हैं।
यह यात्रा आगे की नहीं,
अपने भीतर की है।
और अंत में जो स्थान मिलता है
वह कोई जगह नहीं—
बल्कि स्वयं को पहचानने का
एक निःशब्द क्षण है।
जी आर कवियुर
30 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)
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