विचार आते हैं जैसे तेज़ हवा का झोंका
ख़ामोशी बिना जाने, बोलने लगती है
एक हल्की हवा सी छू जाती है, सुकून देती
क्या जीवन नहीं है, धरती की मुस्कान की तरह?
मतलब कितना भी हो, क्या फर्क पड़ता है
ज्ञान की गहराई अनजानी रहती है
मन सब कुछ समझ नहीं पाता व्यर्थ
मनुष्य के जन्म के उद्देश्य हैं और रहस्य
हम खाली रास्तों पर आगे बढ़ते हैं
संध्या की चुप्पी में यादें खुलती हैं
सपने गिरते हैं जैसे प्रतिबिंब ज़मीन पर
गहरे अनुभव हमें शांतिपूर्वक गले लगाते हैं
विचारों की लहरें फिर उठती हैं
बिना निश्चितता के भी हम आगे बढ़ते हैं
हालाँकि सब कुछ तुरंत समाप्त नहीं होता, प्रयास जारी रहता है
हम जीवन के रहस्यों को सीखते हैं, अनजाने में
जी आर कवियुर
12 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)
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