इतना क़रीब आ जाओ, दिल में और जगह ही नहीं
अब और इंतज़ार का, दिल में कोई सब्र ही नहीं
तेरी ख़ामोश निगाहों ने जो कहा एक पल में
वो हज़ारों ही लफ़्ज़ों में भी असर ही नहीं
रात भर जागता रहता है तेरा ख़याल यहाँ
नींद आती तो है लेकिन उसमें सहर ही नहीं
हमने चाहा था सुकूनों का कोई साया मिले
इश्क़ निकला तो वहाँ दर्द का घर ही नहीं
तेरी मौजूदगी ही अब मेरी पहचान बने
तेरे बिन इस ज़माने में मेरा सर ही नहीं
जी आर कहे ये ग़ज़ल भी तुझे सौंप दी आज
तेरे सिवा अब किसी और पे नज़र ही नहीं
जी आर कवियुर
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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