Friday, January 30, 2026

“तेरे बिना बसंत” (ग़ज़ल )

 ““तेरे बिना बसंत” ( ग़ज़ल )



तेरे बिना बसंत भी बेकार लगती है  
दिल के आईने भी फीके लगते हैं  

आँखों में तैरते हैं सिर्फ तेरे ख्वाब  
हवाओं में बिखरी खुशबू भी फीकी लगती है  

रात की चादर में चाँद भी शर्माता है  
तेरी यादों की चाँदनी भी फीकी लगती है  

दिल की तन्हाई में तेरा ही असर है  
हर धड़कन बस तेरे ही तक़रार लेती है  

वक़्त भी रुक जाता है जब तू पास होती है  
साँसें भी तेरी महक से बेकरार लगती हैं  

जो भी लिखा है, वो सिर्फ तेरे इश्क़ की खातिर  
जी आर की कलम भी तेरे आगे झुकती है

जी आर कवियुर 
30 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अकेले विचार – 132

अकेले विचार – 132

जब यह समझ आया कि छोड़ने को कुछ भी नहीं,
तो हर रास्ता अर्थपूर्ण लगने लगा।
हाथों में जो बंधा था वह बोझ नहीं था—
हर संबंध
पुण्य की मौन मुहर बन गया।

जीवन किसी लक्ष्य तक पहुँचने की दौड़ नहीं,
बल्कि धीरे-धीरे चलने वाली
पुण्य संचित करने की तीर्थयात्रा है।
वहाँ सफलता और असफलता
एक ही पथ की परछाइयाँ हैं,
और पीड़ा भी मार्गदर्शक बन जाती है।

हानियाँ शून्यता नहीं,
अंतरात्मा की ओर बुलावे हैं।
यह यात्रा आगे की नहीं,
अपने भीतर की है।

और अंत में जो स्थान मिलता है
वह कोई जगह नहीं—
बल्कि स्वयं को पहचानने का
एक निःशब्द क्षण है।


जी आर कवियुर 
30 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

मेरे अंदर का मैं नहीं जानता (ग़ज़ल)

 
मेरे अंदर का मैं नहीं जानता (ग़ज़ल)



साँसों में बँधे बिना, शाखाएँ बिना  
जीवन का सागर फैला, किनारा बिना  

खड़ा जो बच्चा, उसकी तरह सोचूँ  
सफर की तैयारी, मार्गदर्शक बिना  

मन के किले जो बनाए, धीरे-धीरे  
बिखरते चले, समय के हाथ बिना  

परिवर्तन आते रहे, पकड़ न सका  
समझ के बिना, आँखों के पास बिना  

अंदर की पुकार सुनी कई बार  
संघर्ष करते रहे, उत्तर बिना  

सिफ़ारिश करना और सराहना का मोह  
बंधन में बँधा, स्वतंत्रता बिना  

सबेरे तक सपनों को संजोते रहे  
जाग उठा “जी आर” मैं — स्वयं का ज्ञान बिना

जी आर कवियुर 
30 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Thursday, January 29, 2026

सदा तेरी यादें (ग़ज़ल)

सदा तेरी यादें (ग़ज़ल)

सदा रहे तेरी यादें, ऐ ख़ुदा  
न हो जुदा मेरे ख़ुदा  

हर साँस में तेरा नाम बसा रहे  
हर रास्ता तुझ तक ही जा मिले, ऐ ख़ुदा  

जब टूट जाए हौसलों का सफ़र  
तेरी रहमत बने मेरा हमसफ़र, ऐ ख़ुदा  

गुनाहों का बोझ जब भारी लगे  
तेरा नाम ही दिल को हल्का करे, ऐ ख़ुदा  

आँखों में बसी तेरी रोशनी रहे  
हर अँधेरे को तू ही तो झकझोर दे, ऐ ख़ुदा  

दिल की दुआओं में तू ही शामिल रहे  
हर ख्वाहिश में बस तेरा ही असर रहे, ऐ ख़ुदा  

मुक़द्दर में अगर दूरियाँ आयें  
तेरी यादें ही साथ हों और न कोई फ़ासला रहे, ऐ ख़ुदा  

तू ही सब कुछ है, तू ही खुदा  
जी आर की मोहब्बत में खोया, ऐ ख़ुदा

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

आधी राह

आधी राह

आधी राह पर ठहर गया हूँ मैं,
साँसों में एक मदमाती मुस्कान है।
कदमों के अर्थ को ढूँढते हुए,
अनजाने छोरों को निहारता हूँ।

कभी-कभी नज़रें नीचे झुक जाती हैं,
सपनों का एक द्वार खुल जाता है।
बिजली की तरह यादें चमकती हैं,
और पल वक़्त संग खेलते जाते हैं।

जीवन-पथ को विस्तृत करने को तैयार हूँ,
पहली किरण की प्रतीक्षा है।
हृदय में आशा का दीप जल उठा है,
और एक नई यात्रा आरम्भ है।

जी आर कवियुर 
16 01 2026
( कनाडा, टोरंटो )

खुद को खो गया (ग़ज़ल)

खुद को खो गया (ग़ज़ल)

जिंदगी के दाव पर तेरी मोहब्बत को रखा गया
हर वक्त तेरे नाम पर खुद को खो गया

तेरी यादों में ही मेरी दुनिया बसी रही
हर खुशी-ग़म में सिर्फ़ तुझ पर ही खो गया

खुद को पाया नहीं, तेरी चाहत में भटका
हर रास्ते पर तेरी ही रोशनी में खो गया

कोई अपना नहीं, कोई दूर नहीं रहा
तेरे बिना इस दिल का हर रंग फीका-सा खो गया

मोहब्बत की राह में सब कुछ न्योछावर किया
हर सांस में तेरे नाम का असर ही खो गया

दुनिया की हर दौलत और शोहरत भी फिकी
तेरी हँसी की खातिर सब कुछ ही खो गया

जी आर की दास्ताँ भी सिर्फ़ तुझ तक सिमटी
इस इश्क़ के समंदर में खुद ही खो गया


जी आर कवियुर 
28 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

सदा तेरी यादें (ग़ज़ल)

सदा तेरी यादें (ग़ज़ल)



सदा रहे तेरी यादें, ऐ ख़ुदा  
न हो जुदा मेरे ख़ुदा  

हर साँस में तेरा नाम बसा रहे  
हर रास्ता तुझ तक ही जा मिले, ऐ ख़ुदा  

जब टूट जाए हौसलों का सफ़र  
तेरी रहमत बने मेरा हमसफ़र, ऐ ख़ुदा  

गुनाहों का बोझ जब भारी लगे  
तेरा नाम ही दिल को हल्का करे, ऐ ख़ुदा  

आँखों में बसी तेरी रोशनी रहे  
हर अँधेरे को तू ही तो झकझोर दे, ऐ ख़ुदा  

दिल की दुआओं में तू ही शामिल रहे  
हर ख्वाहिश में बस तेरा ही असर रहे, ऐ ख़ुदा  

मुक़द्दर में अगर दूरियाँ आयें  
तेरी यादें ही साथ हों और न कोई फ़ासला रहे, ऐ ख़ुदा  

तू ही सब कुछ है, तू ही खुदा  
जी आर की मोहब्बत में खोया, ऐ ख़ुदा

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

Monday, January 26, 2026

रात ढली, चाँद भी सो गया… (ग़ज़ल)

रात ढली, चाँद भी सो गया… (ग़ज़ल)

रात ढली, चाँद भी सो गया,  
मेरे अंदर का दर्द ही बाकी रहा।  

तेरी आँखों में भरे अश्कों की आग,  
विरह की तपिश भी बाकी रहा।  

इंतजार की छाया मुरझा गई,  
दिल में बुने ख्वाब ही बाकी रहा।  

सागर की लहरें किनारे से टकराईं,  
लहरों में पीड़ा ही बाकी रही।  

कहे हुए शब्द हवा में उड़ गए,  
अनकहा सच ही बाकी रहा।  

समय सब कुछ मिटा देगा,  
यादों में छुपा दर्द ही बाकी रहा।  

कविता के साथ फिर भी ये 
कवि जी आर का दिल ही बाकी रहा।

जी आर कवियुर 
25 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

इस बहाव का अंत ( कविता )

इस बहाव का अंत ( कविता )

शहर की हलचल में अकेलापन  
तुम पास होने के बावजूद ऐसा क्यों?  
बिना जलाए भी दीपक जलता है  
पर तुम्हारा प्रकाश कहीं खो सा गया  

एक बार मुड़कर देखो तो भी  
जानने की चाह में सब कुछ गायब हो जाता है  
ज्ञान की गहराई को छूने की कोशिश में भी  
सच्चाई कहीं अनजानी रह जाती है  

अक्षरों के दर्द की कलम जब टूटती है  
तब, मौन में  
तुम — कविता बनकर जन्म लेते हो  

अंगुलियों की चोट में दर्द छुपा रहता है  
कविता, जब तुम्हारा हल्का दर्द महसूस होता है  
तभी समझ आता है  
वही सुख है  

पहाड़ से बहती झरने की तरह  
एकाएक शांत हो जाना  
मेरी लय वहीं थम गई।

जी आर कवियुर 
26 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

26 01 2026 – कविता की ओर एक विचार

26 01 2026 – कविता की ओर एक विचार

समय का एक वृत्त,
शुरुआत और अंत एक जैसे,
दिन अपने भीतर ही लिपटता है,
क्षण शांत प्रतिबिंब में घूमते हैं।

हर अंक एक धड़कन,
हर शून्य एक विराम,
जैसे विचार वहीं लौट आते हैं जहाँ से शुरू हुए थे,
जैसे कविताएँ वहीं खत्म होती हैं जहाँ से जन्मी थीं।

कैलेंडर फुसफुसाता है:
समय में भी साम्य है,
गुज़रते क्षणों में भी लौटाव है।

और फिर भी,
समय में अपनी ताकत है।

जी आर कवियुर 
26 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Sunday, January 25, 2026

नींद चुराई तूने (ग़ज़ल)

नींद चुराई तूने (ग़ज़ल)

मेरे ख़्वाबों को चुराया तूने  
रातों की नींद चुराई तूने  

दिल की गली में आई तेरी याद  
हर खुशी मेरी चुराई तूने  

चाँदनी भी शरमा गई तेरे आने से  
रातों की रौनक चुराई तूने  

ख़ामोशी में भी तेरा असर है  
मेरी सांसों की हसरत चुराई तूने  

हर दर्द को हँसी में बदल दिया  
मोहब्बत की राहें जी आर  

तेरी आँखों में बसी है कहानी मेरी  
हर सपना तूने सुनाई जी आर

जी आर कवियुर 
25 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

छुपा लूँ दिलों को (ग़ज़ल)

छुपा लूँ दिलों को (ग़ज़ल)


जुल्फ़ों के साए में छुपा लूँ दिलों को,  
वरना हम यूँ ही लूट लेते दिलों को।  

नज़र की ठोकर से जलती हैं रातें,  
सुलगते हैं हम भी बुझा न पाए दिलों को।  

महफ़िल में खामोश हूँ मैं, पर जानो,  
हर इक मुस्कान चुरा लेती हैं दिलों को।  

तेरी यादों की गली में खो गए हम,  
छू कर तेरी तस्वीर खो बैठे दिलों को।  

जी आर की तन्हाई में ढूँढा हर पल,  
बस वही मिली सच्ची मोहब्बत दिलों को।

जी आर कवियुर 
24 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अकेले विचार – 131

अकेले विचार – 131

जब जीवन का अर्थ समझ में आता है
हृदय कृतज्ञता से भर जाता है
यदि प्राप्ति में देर भी हो जाए
आशा को छोड़ना नहीं चाहिए

समय अवसरों की परीक्षा लेता है
धैर्य रखने वाले ही आगे बढ़ते हैं
अधीरता राह भटका सकती है
विश्वास मार्ग दिखाता है

आँखें मन की भाषा कहती हैं
मौन छिपे दुःख को उजागर करता है
स्पर्श सांत्वना बन जाता है
शब्द दिल को छू लेते हैं


जी आर कवियुर 
25 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

Saturday, January 24, 2026

प्यार इस राह में” (ग़ज़ल )

प्यार इस राह में” (ग़ज़ल )

तन्हाई में भी महसूस है प्यार इस राह में  
हर पल मेरे साथ है प्यार इस राह में (x2)

चाँदनी भी सजी है बेकार  
तेरे ख्यालों से ही रोशन है प्यार इस राह में (x2)

सफर लंबा सही, मगर आसान है  
तेरी यादों के संग मिलता है सहारा इस राह में (x2)

ख्वाब जो टूटे थे कभी बेकार  
अब तेरी मुस्कान सजाती है प्यार इस राह में (x2) 

साया भी बन जाता है उजाले में  
हर पल तू ही है मेरे पास प्यार इस राह में (x2)

जी आर की कलम से लिखी ये शायरी  
हर लफ्ज़ कहता है बस तुझसे है प्यार इस राह में(x2)


जी आर कवियुर 
23 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Friday, January 23, 2026

बिंदी अथवा तिलक (कविता)

बिंदी अथवा तिलक (कविता)

भौंहों के बीच ललाट पर  
निशब्द जो चमक उठे एक बिंदु,  
तुरीय अवस्था को शीतलता देने वाला  
ध्यान का कोमल स्पर्श।  

बिंदी नाम से नहीं उसकी सुंदरता,  
समयों ने सहेजी हुई संस्कृति है वह,  
एक ही दृष्टि में कह जाने वाली  
स्वाभिमान की मौन भाषा।  

लाल हो या काली — विषय यह नहीं,  
अंदर की अग्नि और शांति है असल,  
मौन में भी दृढ़ता से खड़ा  
एक सशक्त चिन्ह है वह बिंदु।  

शब्दों से पहले जो बोल उठे,  
एक सूक्ष्म प्रकाश की तरह,  
आभूषण से परे वहाँ  
कुलीनता खिल उठती है।  

मस्तक पर दमकते उस चिह्न में  
इतिहास और विश्वास घुल जाते हैं,  
संस्कृति की गरिमा में  
नारी गरिमामय होकर खड़ी रहती है।

जी आर कवियुर 
23 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Thursday, January 22, 2026

यादों की रेल” (गीत)

यादों की रेल” (गीत)

आईए हमसे यादों की रेल पे चलकर देखिए,
बीते पलों की खुशबू फिर से महसूस कीजिए।

हर मोड़ पर छुपी हुई एक कहानी मिल जाएगी,
दिल के आईने में वही झलक हमें दिखाई देगी।

हवाओं में बसी आपकी मीठी बातें सुनिए,
चाँदनी रातों में अपना बचपन याद कीजिए।

पलकों पर सजे कुछ खट्टे-मीठे अनुभव हैं,
उन यादों को आज फिर अपने दिल में दबाइए।

संगीत की लहरों में खो जाइए आप और मैं,
बीती यादों के सफ़र को फिर से जी लीजिए।

हाथों में हाथ लेकर चलें उन गलियों में,
जहाँ हंसी और प्यार की खुशबू हमेशा बसी थी।

जी आर कवियुर 
23 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

निगाहों में (ग़ज़ल)

निगाहों में (ग़ज़ल) 

निगाहों में छुपा के रखा है तुझे,  
जहाँ भी देखा, सारे जहाँ में पाया है तुझे।  

दिल की किताब में नाम तेरा लिखा है,  
हर साज़ में तेरी याद का साया पाया है तुझे।  

चाँदनी रात में तेरा ही चेहरा दिखता है,  
सन्नाटों में भी तेरी आवाज़ गूंजता पाया है तुझे।  

वो जो हँसी तेरी है, बहारों की तरह,  
सूनी राहों में भी खुशबू बिखरी पाया है तुझे।  

तन्हाई में भी तू पास ही लगता है,  
सपनों की दुनिया में तू साथ ही पाया है तुझे।  

हर जज़्बात में तेरी मोहब्बत बसती है,  
हर धड़कन में तेरी यादें रहती पाया है तुझे।  

तेरी मोहब्बत के आगे सब व्यर्थ है,  
जी आर के अल्फाज़ ही सबसे मुनासिब पाया है तुझे।

 जी आर कवियुर 
22 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)


“फूल की कोमलता”

“फूल की कोमलता”


फूल की कोमलता हवा में गा रही है  

रंग-बिरंगे पंखुड़ियाँ हृदय को छूती हैं  

मृदु लाल रोशनी में  

तेरी याद फूलों में घुल जाती है  


ठंडी हवा में खुशबू बहती है  

नन्हे घंटियों की तरह मृदु आवाज़ गूँजती है  

कुछ क्षण चुपचाप  

प्रेम के हृदय में चमकते हैं  


तारों जैसी चमकती आँखें  

फूल की कोमलता, अनुराग का स्पर्श  

संध्या की मृदु रोशनी में  

हमारा प्रेम शांतिपूर्वक खिलता है


 जी आर कवियुर 

22 01 202

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( कनाडा, टोरंटो)

“तेरे हृदय की सहमति”

“तेरे हृदय की सहमति”

तेरे हृदय की सहमति मुझे ढूँढते आई  
तेरी खामोश आँखों में प्रेम खिल उठा  
सालों में, दर्द और खुशी दोनों  
हमने जीवन के रास्तों पर साथ चले  

यादें फूलों की तरह खिल गईं  
हमारे हृदय में प्रेम चमकता रहा  
शांत गर्मी की संध्या ने हमें घेरा  
वो क्षण जब लगा कि हम सच में एक हैं  

दूरी कोई मायने नहीं रखती, हम साथ हैं  
समय और मौसम हमें हिला नहीं पाए  
हाथ में हाथ, तेरा हाथ मेरे हाथ में  
जीवन की सारी रातें और दिन हमारे हों

 जी आर कवियुर 
22 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)



“समुद्र का पुल”

“समुद्र का पुल”

समुद्र के पुल पर लहरें पुकारती हैं  
तट उन्हें स्नेह से प्रतीक्षा करता है  
पानी और रेत के बीच अनकहे शब्द  
चुपचाप प्रेम बनकर बहते हैं  

आसमान नीचे देखकर मुस्कुराता है  
तारे रात में धीरे से आँख झपकाते हैं  
प्रकृति दूरियों को पास लाती है  
स्नेह के रास्ते खोल देती है  

पहाड़ शांति से खड़े रहते हैं  
पेड़ प्रेम से पास आकर जुड़ जाते हैं  
वियोग भूलकर प्रकृति कहती है  
सबको जोड़ने वाला पुल है—प्रेम



 जी आर कवियुर 
22 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)

जब खिड़की खुली,

जब खिड़की खुली, 

जब खिड़की खुली, हवा आई  
तेरी यादें पंख फैलाकर उड़ गईं  
नीले आसमान में पक्षियों ने मधुर गीत गाए  
मेरा हृदय तेरी उपस्थिति में नाच उठा  

फूल खिले और अपनी खुशबू बिखेरी  
ठंडी हवा में मिट्टी की महक फैल गई  
छाँव के नीचे हम हँसते हुए खड़े रहे  
सौम्य धूप में प्रेम खिल उठा  

नदी के किनारे धीरे-धीरे ध्वनियाँ बह रही थीं  
बादल नीले आसमान में फैल गए  
रात की बारिश में आँसुओं से भीगी आँखें  
मेरा हृदय तेरे स्पर्श में घुल गया


 जी आर कवियुर 
22 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)

बरगद के बाग़ में

बरगद के बाग़ में 

बरगद के बाग़ में हवा बह रही है  
परछाइयाँ धीरे-धीरे गा रही हैं  
फूल खिले और अपनी खुशबू बिखेरी  
पक्षी मधुर गीत गा रहे हैं  

ठंडी हवा में मिट्टी की खुशबू फैलती है  
छाँव में शांति भर जाती है  
चमेली के फूल ओस की बूँदों से झिलमिलाते हैं  
सूनियों गलियों की ख़ामोशी गूँजती है  

नदी के किनारे धीरे-धीरे ध्वनियाँ बह रही हैं  
बादल नीले आकाश में छा रहे हैं  
रात की बारिश से आँसुओं का बहाव  
हृदय प्रकृति में विलीन हो जाता है

 जी आर कवियुर 
22 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)

Wednesday, January 21, 2026

“चिट्ठियाँ लिखता नहीं” (ग़ज़ल)

“चिट्ठियाँ लिखता नहीं” (ग़ज़ल)

आज कोई भी चिट्ठियाँ लिखता नहीं  
सबकी नज़र पर अब कहानियाँ लिखता नहीं  

दिल से जो निकले वो लफ़्ज़ खो गए हैं कहीं  
आईने में भी अब सच्ची कहानियाँ लिखता नहीं  

काग़ज़ की ख़ुशबू भी अजनबी हो गई है आज  
यादों के नाम ख़तों की कहानियाँ लिखता नहीं  

हाथों में फोन है, मगर दूरी वही की वही  
रिश्तों को जोड़ने की नई कहानियाँ लिखता नहीं  

ग़ज़ल ने मोड़ लिया अपना चेहरा इस क़दर  
दर्द को दर्द की तरह कहानियाँ लिखता नहीं  

जी आर इस दौर की यही पहचान बन गई  
जो दिल पे बीते वो अफ़साने की कहानियाँ लिखता नहीं


जी आर कवियुर 
21 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Tuesday, January 20, 2026

ठंडी बारिश



ठंडी बारिश

ठंडी बारिश पहाड़ों पर धीरे-धीरे गिरती है  
रात की राहें कोहरे में लिपटी रहती हैं  
मिट्टी की खुशबू हृदय में भर जाती है  
पत्तियाँ ठंडे बूँदों में चमकती हैं  

हवा धीरे-धीरे पेड़ों को स्पर्श कर जाती है  
नदियाँ शांत रूप से नीले पानी में बहती हैं  
पक्षी खुशी से गीत गाते हैं  
बारिश की बूँदें फूलों पर मुस्कुराती हैं  

पानी दोनों किनारों को स्नेहपूर्वक छूता है  
यादें ऊपर से धीरे-धीरे टपकती हैं  
पल ठंडी बारिश में भीग जाते हैं  
सपने नींद को ठंडक के साथ छूते हैं

जी आर कवियुर 
20 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

नीला आकाश

नीला आकाश

नीला आकाश फैला, मौन और विशाल  
बादल भटके धीरे, सपनों की चाल  
सूरज की किरणें चूमें दूर की पहाड़ी  
हवा लाए यादें, नरम और साधी  

पंछी बनाएं चित्र आनंद के पल  
तारे जगाएं धीरे, रात की हलचल  
छायाएँ कहें समय की कथा  
मन सुनता भीतर की गूँज गाथा  

प्रकृति देती शांत सांस की बेला  
विचार बहें मुक्त, बिना किसी खेला  
जीवन के पाठ निकलें नीरव धार में  
हृदय जागे सपनों के संसार में

जी आर कवियुर 
20 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

जहाँ सच्ची मुहब्बत होगी” (ग़ज़ल)

जहाँ सच्ची मुहब्बत होगी” (ग़ज़ल) 

हमें तुम सच्चे दिल से पुकारोगे, चले आएँगे  
हक़ीक़त जान लो, मुहब्बत होगी तो चले आएँगे  

तेरी एक नज़र की देर है बस ऐ सनम  
हम हर फ़ासला पल में मिटाकर चले आएँगे  

कभी तन्हाई में याद कर लेना हमें  
तेरी ख़ामोशी सुनकर हम चले आएँगे  

न वक़्त की क़ैद होगी, न हालात का डर  
जहाँ भी नाम लोगे तुम्हारा, चले आएँगे  

अगर आँसू गिरें तेरी पलकों से कभी  
उन्हें अपना समझकर सँभालने चले आएँगे  

भरोसा रखो मेरे वफ़ा के सफ़र पर  
तेरी हर राह में हमसफ़र बन चले आएँगे  

जी आर कहते हैं, ये दावा नहीं एक इकरार है  
जहाँ सच्ची मुहब्बत होगी, हम चले आएँगे

जी आर कवियुर 
20 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

यादों की कहानी आज भी” ( ग़ज़ल)

यादों की कहानी आज भी” ( ग़ज़ल)

वह बीते हुए दिनों की कहानी आज भी  
मन को इतना सताते हैं, याद की निशानी आज भी  

दिन और रातें, वो मुलाक़ातें हमें  
इतना रगिन लगाती हैं, छू जाती आज भी  

मन में यह बात नहीं मिटती कभी  
वो सब मिलके ग़ज़ल बनती आज भी  

चाँदनी में डूबी हमारी बातें  
दिल को फिर भी जलाती हैं आज भी  

हँसी तेरी, वो मीठी नज़रों की बातें  
भटकते मन को पिघलाती हैं आज भी  

वो दूरी, वो तन्हाई, वो बेवफ़ाई  
यादों के रंग में बसाती हैं आज भी  

जी आर कहते हैं, मेरे दिल की सुनो कहानी  
शब्दों में बसी रहती है मेरी जवानी आज भी


जी आर कवियुर 
20 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Monday, January 19, 2026

मैं तुझे चाहता हूँ”(ग़ज़ल)

मैं तुझे चाहता हूँ”(ग़ज़ल)

कसमसे कहता रहूं, मैं तुझे चाहता हूँ  
कीमत नहीं है किसी चीज़ की, फिर भी मैं तुझे चाहता हूँ  

तेरी यादों में खोया हर एक सवेरा  
दिल की धड़कनों में बस तू ही मेरा, मैं तुझे चाहता हूँ  

चाँदनी भी शरमाए तेरे नखरे देखकर  
सितारे भी गिरे तेरी राहों में, मैं तुझे चाहता हूँ  

ज़िंदगी की राहों में तेरा नाम लिखा  
हर धड़कन में बस यही पैग़ाम लिखा, मैं तुझे चाहता हूँ  

तेरे चेहरे की मुस्कान ही बस मेरा सहारा  
सन्नाटों में भी गूंजे तेरा प्यारा, मैं तुझे चाहता हूँ  

हवाओं में महके तेरी खुशबू हर पल  
सपनों में तेरा ही चलता कल, मैं तुझे चाहता हूँ  

पलकों पे सजती रहे तेरी यादों की परछाई  
हर सुबह तेरा ही आए, मैं तुझे चाहता हूँ  

दिल की दीवारों पर असर तेरा है जी आर  
तुम्हारे बिना इस दिल का कोई करार, मैं तुझे चाहता हूँ  

तेरी बातों में छुपा हर एक जादू  
सुनकर मैं हमेशा रहूं तुझसे वाकू, मैं तुझे चाहता हूँ  

रातें भी तुझसे मिलने को बेकरार  
जी आर के बिना हर ख्वाब हो बेकार, मैं तुझे चाहता हूँ

जी आर कवियुर 
19 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Saturday, January 17, 2026

“मौत के पार” ( सूफी ग़ज़ल)

“मौत के पार” ( सूफी ग़ज़ल)

मौत के पार जो राह दिखाए कोई,  
उस नूर की तलाश में हर दिल आए कोई।(X2)  

इस जहां की उलझनों से दूर चले हम,  
रूह के सफर में मिल जाए वो अमूल्य कोई।(X2)    

धड़कनों में छुपा है जीवन का सच,  
मृत्यु के बाद भी साथ रहे वो कोई।(X2)    

अंधेरों से पार उतरे, रौशनी की ओर,  
रूह की प्यास बुझाए वही कोई।(X2)  

हर सांस में याद उसका, हर पल उसकी गूँज,  
मोहब्बत की राह में दिखाए रास्ता कोई।(X2)  

मौत भी माया है, जीवन की सीख है,  
जी आर की तन्हाई में मिलता सुकून वही कोई।(X2)

जी आर कवियुर 
16 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

विचारों के परे

विचारों के परे

विचारों के परे, हृदय शांति से धड़कता है  
प्रभात की कोमलता मन में आनंद भर देती है  
तारों के पंखों पर आकांक्षाएँ पनपती हैं  
हवा की ध्वनि स्मृतियों के प्रवाह में मिल जाती है  

आसमान की नीली छाया में विश्वास फैलता है  
स्मृतियों की नींद में एक लय बहती है  
नदी की लहरों में भावनाएँ उमड़ती हैं  
चाँदनी की रौशनी में राग फैलता है  

जीवन एकांत में नया रूप लेता है  
आशा की नाव में एक स्वर बहता है  
आंखों में भावनाओं की लहर चमकती है  
प्रभात की कोमलता में प्रेम खिलता है

जी आर कवियुर 
16 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Friday, January 16, 2026

हवा की ध्वनि


हवा की ध्वनि

हवा की ध्वनि पेड़ों में ताल बिखेरती है  
नदी का संगीत लहरों पर नृत्य करता है  
चाँदनी की रौशनी में शांति फैलती है  
तारे तरंगों के साथ आंख मारते हैं  

आसमान की नीली छाया में ध्वनियाँ फैलती हैं  
मन की धाराओं में सपने उमड़ते हैं  
स्मृतियों की नींद में एक राग पंख फैलाता है  
प्रभात की कोमलता हृदय को सहलाती है  

जीवन एकांत में लय लेता है  
हृदय स्पंदनों की धुन में आनंदित होता है  
आशा की नाव में स्वर भरते हैं  
नवरात्रि की रातों में आंखों में शांति चमकती है

जी आर कवियुर 
16 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

माणिक्य वीणा

माणिक्य वीणा

गुप्त ताल में वीणा की धुन धीरे-धीरे फैलती है  
वीणा के तारों में आत्मा जाग उठती है  
तारे तरंगों के साथ आंख मारते हैं  
चाँदनी की चादर में राग फैलता है  

हवा की कोमलता में स्पंदन उठता है  
मन की धाराओं में लय बहती है  
स्मृतियों की नींद में एक सपना पंख फैलाता है  
आसमान की नीली छाया में शांति उतरती है  

जीवन एकांत में नया रूप लेता है  
हृदय स्मृतियों की खुशियाँ बाँटता है  
आशा की नाव में स्वर भरते हैं  
भोर में वीणा की दृष्टि चमकती है

जी आर कवियुर 
16 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अर्धरात्रि का फूल

अर्धरात्रि का फूल

अर्धरात्रि में एक फूल खिलता है  
तारों की साँसें जब छूती हैं  
अंधेरे की गोद में महक फैलती है  
जागता चाँद उसे निहारता है  

हवा धीरे से रहस्य कहती है  
पत्तियाँ काँपते हुए सुनती हैं  
एक अकेली रोशनी राह दिखाती है  
खामोशी के भीतर संगीत जन्म लेता है  

भटका हुआ सपना मुस्कुरा उठता है  
दिल एक पल को ठहर जाता है  
अनजाने में आत्मा जाग उठती है  
और रात खुद फूल बन जाती है

जी आर कवियुर 
16 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

आधी राह

आधी राह

आधी राह पर ठहर गया हूँ मैं,
साँसों में एक मदमाती मुस्कान है।
कदमों के अर्थ को ढूँढते हुए,
अनजाने छोरों को निहारता हूँ।

कभी-कभी नज़रें नीचे झुक जाती हैं,
सपनों का एक द्वार खुल जाता है।
बिजली की तरह यादें चमकती हैं,
और पल वक़्त संग खेलते जाते हैं।

जीवन-पथ को विस्तृत करने को तैयार हूँ,
पहली किरण की प्रतीक्षा है।
हृदय में आशा का दीप जल उठा है,
और एक नई यात्रा आरम्भ है।

जी आर कवियुर 
16 01 2026
( कनाडा, टोरंटो )

Wednesday, January 14, 2026

गुलमोहर

गुलमोहर

पुराने गुलमोहर की छाया में  
हमारी यादें धीरे-धीरे बिखरी  
आँसुओं में हँसी, दिल में प्यार  
दिन की रौशनी भी न उसे मिटा पाए  

लाल फूल, जैसे दिल का अपना रंग  
आँखों में चमके, याद बन कर संग  
हवा के स्पर्श में धीरे-धीरे हिले  
पक्षियों के गीत जैसे गुनगुनाए  

जीवन की राहों में, तुम और मैं  
सालों बाद, फिर से मिले यहाँ  
तारों की खामोशी ने सुनी हमारी  
यादों की कोमलता फिर खिल उठी

जी आर कवियुर 
14 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

भरोसे का इश्क़ (ग़ज़ल)

भरोसे का इश्क़ (ग़ज़ल)


आवारा बनकर वीराने में भी भटका तेरे प्यार के लिए  
हर एक मंज़िल छोड़ दी हमने, बस तेरे दीदार के लिए (X2)

हर एक दर्द को सीने से हमने जोड़ा है  
तेरी एक मुस्कान की राहत के लिए (X2)
  
रातों ने हमसे नींद का रिश्ता ही तोड़ दिया  
जागते रहे हम सिर्फ़ तेरी याद के लिए (X2)  

तू सामने नहीं, फिर भी भरोसा बाक़ी है  
दिल ने दुआएँ माँगी हैं हर पल के लिए (X2)
 
हमने खुदा से भी कभी सौदा नहीं किया  
बस सर झुकाया है तेरे इश्क़ के लिए (X2)  

ज़माने भर की समझदारी छोड़ आए हैं  
थोड़ी सी पागलपन की इजाज़त के लिए (X2)
  
“जी आर” नाम भी अब अजनबी सा लगता है  
जब लोग पूछते हैं हमें, तेरे नाम के लिए (X2)


जी आर कवियुर 
14 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

लाल मिर्च की शान

लाल मिर्च की शान

मानव के सपने, उनका गर्व है ऊँचा  
राजनीति, समझौते, विश्वास सब हो जाते फँसा  
कल हो सकता है खुशी, या अकेले दिल का बंटवारा  
नींद भी एक छोटा सा मृत्युवाले किनारा  

सब कुछ तय करता केवल एक — भगवान ऊपर  
मनुष्य सोचता है राजा, प्यार और शक्ति का धनी  
फिर भी वही बनाता राह, अदृश्य और अज्ञात  
लाल मिर्च जलती आग में, चमकती और प्रखर  

फूलों के बीच वह हँसती, जानती अपनी कीमत  
मोहकता, ताकत, स्वाद — सब उसके भीतर समेट  
अन्य मिर्चों में वह सबसे आगे खड़ी  
“मैं सबसे गर्म, मैं ही दुनिया की रानी” कहती  

उसकी अनोखी तीखापन बदलता कुछ नहीं  
उसकी याद में — स्वाद, सुंदरता, गर्व झिलमिलाती  
संपूर्ण संसार में मनुष्य प्रकृति को छोटा समझता  
लेकिन केवल भगवान देखता हर कदम, हर दिशा  

मिर्च की गर्मी, मानव की परीक्षाएँ, जीवन की कसौटी  
सब एक ही रास्ते पर — सृष्टि, स्थिति, विनाश की गाथा  
आकाश और पृथ्वी के बीच केवल एक चलता स्वतंत्र  
जीवन, मृत्यु, गर्व, प्रेम — प्रवाहित होते लगातार  

फूल की मिठास, लाल मिर्च, मानव के सपने भी  
भगवान की योजना में बुनाई हुई, सबका दृश्य समा  
वे सब एक कविता में जुड़ते, नृत्य और गीत गाते  
कवि की कलम से, शब्द शक्तिशाली होकर बहते

जी आर कवियुर 
13 01 2026
 (कनाडा, टोरंटो)

चैत्रनिशीथिनी

चैत्रनिशीथिनी

चैत्रनिशीथिनी की महक से भरी
घास भरे रास्तों पर छाया पड़ी
दिन के आँसुओं में सूर्य चमका
रात की शांति मौन और स्थिर रही

फूलों की कोमलता दिलों तक उठी
हवा में प्रेम का गीत गूंजा
नदी की सरसराहट किनारों पर बहती रही
आसमान में पक्षियों की आँखें चमकीं

नीले आकाश के नीचे सपने भर गए
वसंत के कली धीरे-धीरे मुस्कुराए
मेरा हृदय फूलों में घूमता रहा
चैत्रनिशीथिनी की बारिश में प्रेम बहा

जी आर कवियुर 
13 01 2026
 (कनाडा, टोरंटो)

पुष्पवाड़ी

पुष्पवाड़ी

फूलों से बहती खुशबू
गर्म इंद्रधनुष में भर गई
हल्की हवा की ताल पर नृत्य
फूलों की मुस्कानों में उजाला छाया

नदी का किनारा शांत और स्थिर
छोटे पक्षियों के सुंदर गीत गूंजे
रेतीले रास्तों पर निशान चमके
भोर ने एक कोमल मुस्कान की तरह खुला

हवा के स्पर्श में प्रेम महसूस हुआ
वसंत के रास्तों पर दृश्य बिखरे
मेरा हृदय फूलों के बीच गा रहा था
चाँदनी की शांति बारिश में बह रही थी

जी आर कवियुर 
13 01 2026
 (कनाडा, टोरंटो)

गर्मियों का गीत

गर्मियों का गीत

सुबह की ओस धीरे-धीरे गिरी, जीवन से भरी
अटूट यादों में उमड़ते भाव
नदी की चमक में सुनहरी रौशनी
ठंडी हवा में पर्वत जाग उठे

फूलों की खुशबू चारों ओर फैली
छोटे पक्षियों की मधुर आवाज़ गूंजती रही
वसंत के रास्ते शांत और खामोश
नीला आकाश कविता की तरह खुला

हवा के झोंके में नृत्य करता
संध्या की मुस्कान ने आकाश को रोशन किया
गर्मियों के गीत में मेरा हृदय भीग गया
और पक्षियों से फिर से गीत बहता गया


जी आर कवियुर 
13 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

सुकून मिलता हैं (ग़ज़ल)

सुकून मिलता हैं (ग़ज़ल)

तू जब करीब होतो, दिल को सुकून मिलता हैं  
तेरे ही ख्यालों में दिल को सुकून मिलता हैं (X2)

तेरी मुस्कान की छाँव में, हर शाम कुछ खास लगती हैं  
तेरे ही ख्यालों में दिल को सुकून मिलता हैं (X2)

आँखों में तेरी जो नमी है, हर राज़ दिल में बसता हैं  
दिल की हर धड़कन में बस तेरा ही नाम गूंजती हैं, सुकून मिलता हैं (X2)

राहों में तेरे चलते चलते, हर मोड़ खूबसूरत लगती हैं  
हर ग़म को तेरे प्यार की रोशनी में भुला देती हैं, सुकून मिलता हैं (X2)

जो भी मिला है तुझसे, वो ख्वाबों से भी हसीन लगता हैं  
जी आर तेरे ही नाम में हर दर्द को सुकून मिलता हैं (X2)

तेरे बिना तो हर खुशी भी फीकी-सी लगती हैं  
तेरे ही ख्यालों में दिल को सुकून मिलता हैं (X2) 

जी आर कवियुर 
13 01 2026
 (कनाडा, टोरंटो)

नीले चाँद की मान्त्रिकता (ग़ज़ल)

नीले चाँद की मान्त्रिकता (ग़ज़ल)

नीला चाँद आकाश में धीरे-धीरे आता है  
खामोश रात में कुछ जादू सा छा जाता है (X2)

जो देखा आँखों ने, कह पाना मुश्किल है  
हर ख्याल बादलों सा दूर निकल जाता है (X2)

पत्तों की धारों पर चाँदनी थिरकती है  
मन का हर बोझ यूँ ही हल्का हो जाता है (X2)

रात मुस्काती है, सपने जग उठते हैं  
दिल किसी अनजानी राह पर चल जाता है (X2)

तारे पलकों से जैसे बातें करते हैं  
आकाश का सन्नाटा गीत बन जाता है (X2)

हल्की सी हवा भी कुछ कह जाती है  
अँधेरा हर पल रोशनी बन जाता है (X2)

जी आर कहे, ये चाँद सिर्फ़ आसमान का नहीं  
हर टूटे मन में भी चुपचाप उतर जाता है (X2)

जी आर कवियुर 
12 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

नीले चाँद का जादू

नीले चाँद का जादू

नीला चाँद आकाश में उठता है  
नीली जादू से दिल भर जाता है  
जो देखा, उसे शब्दों में कह नहीं सकता  
बादलों के बीच धीरे-धीरे तैरता है  

प्रकाश पत्तियों के किनारों पर नाचता है  
विचार पहाड़ों पर धुंध की तरह बहते हैं  
रात की हँसी और सपनों की चमक  
नीला चाँद दिल को अपनी ओर ले जाता है  

तारे धीरे-धीरे झपकते हैं, रहस्य छिपाए  
आकाश की नदी शांत बहती है  
मुलायम हवा रात में गीत गाती है  
हर क्षण अंधकार को प्रकाश में बदल देता है


जी आर कवियुर 
12 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

इंद्रधनुष की स्वर

इंद्रधनुष की स्वर


सूर्यकिरणों से छूकर इंद्रधनुष आगे लुप्त हुआ  
हवा ने हल्के बादलों को उठाकर बिखेर दिया  
फूलों के रंग रास्तों पर उतर आए  
वृक्षों की पत्तियाँ गहरी छायाएँ रचने लगीं  

तारे मद्धम हुए, सपनों ने पुकारा  
आधी रात में शांत विचार गूंजे  
नदी की लय में संगीत बह चला  
उषा दीप ने हर कल्पना को आलोकित किया  

नन्हे पंखों ने आकाश में फैलाव लिया  
मिट्टी की सुगंध ने मन को जगाया  
प्रकृति के कोमल स्पर्श ने शांति दी  
जीवन के वर्तमान में इंद्रधनुष की स्वर सुनाई दी


जी आर कवियुर 
12 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

कल का भरोसा

कल का भरोसा

कल का भरोसा  
बीते कल का विश्वास  

बीते कल का विश्वास  
आज में फैलता है  
कल का भरोसा  
आने वाले क्षणों में देखेंगे क्या होगा (X2)

कल का भरोसा  
बीते कल का विश्वास  

प्रतिबिंब गिरते हैं दिलों में  
सपनों के रंग उजागर होते हैं  
जब मौन धीरे-धीरे बोलता है  
क्षण चुपचाप बहते हैं (X2)

कल का भरोसा  
बीते कल का विश्वास  

समय बिना पूछे चलता रहता है  
हम अकेले अर्थ खोजते हैं  
सभी उत्तर अज्ञात  
जीवन आगे बढ़ता है (X2)

कल का भरोसा  
बीते कल का विश्वास

जी आर कवियुर 
12 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

जीवन के रास्ते

जीवन के रास्ते

विचार आते हैं जैसे तेज़ हवा का झोंका  
ख़ामोशी बिना जाने, बोलने लगती है  
एक हल्की हवा सी छू जाती है, सुकून देती  
क्या जीवन नहीं है, धरती की मुस्कान की तरह?  

मतलब कितना भी हो, क्या फर्क पड़ता है  
ज्ञान की गहराई अनजानी रहती है  
मन सब कुछ समझ नहीं पाता व्यर्थ  
मनुष्य के जन्म के उद्देश्य हैं और रहस्य  

हम खाली रास्तों पर आगे बढ़ते हैं  
संध्या की चुप्पी में यादें खुलती हैं  
सपने गिरते हैं जैसे प्रतिबिंब ज़मीन पर  
गहरे अनुभव हमें शांतिपूर्वक गले लगाते हैं  

विचारों की लहरें फिर उठती हैं  
बिना निश्चितता के भी हम आगे बढ़ते हैं  
हालाँकि सब कुछ तुरंत समाप्त नहीं होता, प्रयास जारी रहता है  
हम जीवन के रहस्यों को सीखते हैं, अनजाने में

जी आर कवियुर 
12 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

अश्वमेध नर्तन (गाना)

अश्वमेध नर्तन (गाना)

मर्त्य संहासन हिलते हैं  
विनाश की गर्जनें फूट रही हैं  
नदियाँ क्रोध में बह रही हैं  
हिंसा प्रबल होकर उभरती है (x2)

वितरित सिर इतिहास बन जाते हैं  
आँसू और क्रोध साथ में जल रहे हैं  
विजय का गर्व नृत्य कर रहा है  
न्याय का नाद मिट्टी में समा जाता है (x2)

हृदय की तालों और साँसों में  
निर्भरता की धार में फँसा  
आत्मा डोल रही है  
मौन भी काँप रहा है (x2)

हड्डियों तक क्रोध उठ रहा है  
समय अपनी ताल पर चलता है  
प्रलय नृत्य जब तक समाप्त न हो  
मनुष्य मनुष्य को काटता है (x2)

स्वयं को पहचानो — यही पहली जीत है  
भीतर का ब्रह्मांड साँस ले रहा है  
बाहर की दुनिया और ताल मिल रही है (x2)

मन एक हथियार नहीं, यह महान शक्ति है  
इस क्षण में भय पिघलता है  
शांति फैलती है (x2)

बोध के प्रकाश में  
आत्मा स्वयं ही हथियार और शरण बन जाती है  
मनुष्य अपनी शक्ति को प्रकट करता है (x2)

जी आर कवियुर 
11 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)


अनसुने तम्बुरु

अनसुने तम्बुरु

अनसुने तम्बुरु की लय हवा में बहती है  
ठंडी हवाएँ हृदय में छुपे दर्द को शांत करती हैं  
मध्यान्ह की रात में मधुर ताल की ध्वनि गूँजती है  
छोटे दुख दिन की रोशनी में विलीन हो जाते हैं  

तारों की चमक विचारों को प्रकाशित करती है  
भोर की पहली रोशनी सपनों को संवारती है  
रास्ते छिप जाएँ भी, प्रार्थनाएँ कान तक पहुँचती हैं  
वृक्षों की पत्तियाँ धीरे-धीरे शांति का स्पर्श देती हैं  

नदियों की लहरें लय में नृत्य करती हैं  
सूरज की किरणें हर कोना प्रकट करती हैं  
हृदय में छुपे अनुभव धीरे-धीरे फैलते हैं  
जीवन के संगीत में प्रेम की आवाज़ सुनाई देती है

जी आर कवियुर 
10 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

भले झूठा लगे”

भले झूठा लगे”

भले झूठा लगे, हृदय सच बोलता है  
मौन विचार पलकों में छुपा रहता है  
जब प्रकाश ढलता है, छायाएँ कोमल खेल खेलती हैं  
समय के पथ बिना रास्ता दिखाए खुलते हैं  

आकाश में तारे मंद होते हैं, फिर भी विचार चमकते हैं  
भोर की रोशनी सपनों को हल्की रोशनी देती है  
रास्ते खो सकते हैं, फिर भी आशा चमकती है  
हवा का स्पर्श दर्द को शांति में बदल देता है  

फूलों में छिपे रहस्य धीरे से बोलते हैं  
नदी के तान में संगीत बहता है  
मन के गहराई में प्रतिबिंब चमकते हैं  
जीवन की सीढ़ियों पर सच्चाई की डोर मार्ग दिखाती है

जी आर कवियुर 
10 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)


Saturday, January 10, 2026

तन्हाइयों के ख़्वाब ( ग़ज़ल )

तन्हाइयों के ख़्वाब ( ग़ज़ल )

परदेस में इश्क़ करना मुकम्मल नहीं  
तन्हाइयों में ख़्वाब देखना मुकम्मल नहीं (x2)

हर मोड़ पे बिखरते रहे अपने ही साये  
इस राह में ख़ुद को पाना मुकम्मल नहीं (x2)

लफ़्ज़ों ने बहुत चाहा तुझे छू लें मगर  
ख़ामोशी में हर बात कहना मुकम्मल नहीं (x2)

दिल ने जो निभाई है वफ़ा उम्र भर की  
उसका कोई इनाम मिलना मुकम्मल नहीं (x2)

जी आर ने लिखा भी तो दर्द की स्याही से  
इस दौर में सच कहना मुकम्मल नहीं (x2)

जी आर कवियुर 
10 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

“स्मृतियों की प्रतिध्वनि”

“स्मृतियों की प्रतिध्वनि”

समय की छायाएँ धीरे-धीरे बिखरती हैं  
पुराने घुमावदार रास्तों पर प्रेम बहता है  
मध्यरात्रि की शांत आँखों में छुपा हुआ  
फूल और पथ बीते दिनों की झलकियाँ पहुँचाते हैं  

पंछियों की उड़ान हृदय में गूंजती है  
ठंडी हवाएँ प्राचीन कहानियाँ सुनाती हैं  
छायाओं में चमकती धूप झिलमिलाती है  
मौन साँसों में संगीत का संचार होता है  

नदियों के खेलते सुर मन में ताल बजाते हैं  
वृक्षों की पत्तियाँ हवा के साथ नृत्य करती हैं  
बहते पानी का कोमल स्पर्श सुख प्रदान करता है  
जीवन की पुस्तकों पर छोटी-छोटी स्मृतियों की प्रतिध्वनि मन में पनपती है

जी आर कवियुर 
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )

“हृदय की लय”




“हृदय की लय” 

हृदय की धड़कन स्थिर लय में बजती है  
नदियों के प्रवाह में कोमलता बहती है  
पत्थरों और मिट्टी के बीच छाँव छाई रहती है  
भोर में अनकही कहानियाँ खुलती हैं जो लगती है  

हवाओं में सपने उड़ते पंख फैलाकर  
फूलों के बीच छिपी कोमलता प्रकट होती है बार-बार  
वृक्षों की पत्तियाँ विनम्रता से झुकती हैं प्यार  
मौन रात में विचार गूँजते हैं हर प्यार  

नदियों की लहरें कोमल स्पर्श से बहती हैं  
सूरज की किरणें मार्गों को प्रकाश देती हैं  
मन के गहराई में मुस्कान बहती है मन को छूती हैं  
जीवन के गीत में हृदय की आवाज़ गूँजती हैं

जी आर कवियुर 
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )

जनमभूमि

जनमभूमि

जनमभूमि के बादलों से छूती यादें  
मिट्टी की खुशबू समय को जागरूक करती है  
पथों पर घूमती यात्राओं की कहानियाँ  
मौन में बिखरी कोमलता की सौगात महसूस होती है  

जंगल और हवाएँ पुराने गीत गाती हैं  
पुराने पत्थर की दीवारों पर छाँव फैली है  
नदियों का खेल-खेल संगीत कानों तक गूंजता है  
समय के पंखों पर विचार उड़ान भरते हैं  

घास के मैदानों का स्पर्श ठंडक पहुँचाता है  
आकाश की रोशनी धीरे-धीरे बिखरती है  
किसान ताल में गाते हुए काम जारी रखते हैं  
जीवन के सुर हृदय में गहराई से समा जाते हैं

जी आर कवियुर 
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )

“रंग परिवर्त्तन”


“रंग परिवर्त्तन”

हरे-भरे पर्वत और फैली घाटियाँ  
फूलों की खुशबू समय को जगाती है  
जब हल्की हवा गुनगुनाती है और दूर जाती है  
इंद्रधनुष की मनमोहक चमक जगमगाती है  

बदलती शाम के रूप  
आकाश की रोशनी सुख बिखेरती है  
वृक्षों पर जमी ठंडी बूँदें चमकती हैं  
मौन दृश्य हृदय को पूरी तरह भर देते हैं  

सुबह की परदे में रंगों का रूपांतरण  
खिड़की खोलती है दृश्य की सुंदरता  
मध्यरात्रि की आँखों में छिपे  
सपने ठंडी छाया में पहुँचते हैं

जी आर कवियुर 
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )

Friday, January 9, 2026

दिल की परछाइयाँ” ( ग़ज़ल )

दिल की परछाइयाँ” ( ग़ज़ल )

दूसरों को हम बताते रहे क्या हो गया
ख़ुद का आईना मगर हमसे छुपा हो गया (x2)

कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं, सवालों में ही उलझा
भीड़ में रहकर भी मेरा दिल अकेला हो गया (x2)

कुर्र्त ढूँढने की आदत ने दिल को जकड़ लिया
सोच का हर एक कोना चुपचाप ही सो गया (x2)

मूल्य बिखरे, नितिकता को हम ढोते ही रहे
लाभ की इस दौड़ में इंसान छोटा हो गया (x2)

जिसे माफ़ करने से दिल हल्का हो सकता था
नफ़रतों के शोर में इंसाफ़ रो गया (x2)

जी आर कहता है — अगर नीयत साफ़ रखी
तो यही दुनिया में सबसे बड़ा धर्म हो गया (x2)

जी आर कवियुर 
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )

नग्नता

नग्नता

नग्नता केवल वस्त्रों की कमी नहीं है  
यह वह अवस्था है जहाँ छुपाने को कुछ नहीं बचता  
गरीबी के सामने शरीर खुला खड़ा रहता है  
सम्मान भी रक्षा नहीं कर पाता  

आँखों में चुपचाप शर्म भर जाती है  
ठंड से बचने को हाथ स्वयं को थाम लेते हैं  
शब्द बाहर आने से डरते हैं  
नज़रें सीधे दिल को भेद देती हैं  

नग्न सत्य हर किसी को स्वीकार नहीं होता  
समाज मुँह फेर लेता है  
करुणा मौन बनकर खड़ी रहती है  
और मनुष्य भीतर से टूट जाता है

जी आर कवियुर 
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

दारिद्र्य

दारिद्र्य

एक नन्हा बच्चा बिना भोजन के प्रतीक्षा करता है  
सड़कों के बच्चों की मुस्कान दूर होती जाती है  
पुराने कपड़े मिट्टी से मिलने को तरसते पड़े हैं  
आँसुओं में भीगे दुःख मौन में बोलते हैं  

हाथ भोजन की एक बूँद के लिए फैलते हैं  
साल भर प्रतीक्षित हवा भी सूनी लगती है  
अभाव के बोझ से घर दम तोड़ते हैं  
रोशनी से अनजान, अंधेरे में जीते हुए  

नदी की बूँदें सपनों में बदल जाती हैं  
गर्मियों की ठंडक भी राहत नहीं देती  
ठंडी रातों में भूख अपनी लय चलाती है  
दारिद्र्य हृदय पर अमिट निशान छोड़ जाता है

जी आर कवियुर 
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)


सांध्य किरण

सांध्य किरण 

सुनहरी छाया में सांध्य किरण चमकती है  
नदी की लहरें धीरे-धीरे झूमती हैं  
पहाड़ों के बीच इंद्रधनुष धीरे-धीरे गिरता है  
सालाना हवा में यादें मुस्कुराती हैं  

प्रकृति की हरियाली हृदय को छूती है  
भोर और हवा धीरे-धीरे फैलती हैं  
ठंडी जंगलें मधुर और घना संगीत गाती हैं  
पक्षी धीरे-धीरे उड़ते हैं, पंख फैलाए  

सांध्य फूल गिरते हैं, मिट्टी की खुशबू फैलाते हैं  
सितारे प्रकाश फैलाते हैं, छोटे चमकते तारे  
गर्मी की बारिश की याद मीठा आनंद लाती है  
सांध्य किरण हृदय में मधुरता बिखेरती है

जी आर कवियुर 
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

समुद्र का डाकेता

समुद्र का डाकेता 

समुद्र पार करते समय डाकेता दिखाता है गति  
बरसात की बूँदें गिरती हैं, पत्थरों पर बिखरती हर जगह  
पहाड़ों और रास्तों से वह सावधानी से चलता है  
उंगलियों की तरह, उसकी चाल बहती है हर दिशा में  

हवा के उन्माद में वह छिपा स्थान खोजता है  
अंधेरे की परवाह किए बिना वह चलता रहता है  
नदियों की उपस्थिति भी उसे नहीं रोक पाई  
ठंडी बारिश और बर्फ ने भी नहीं रोका रास्ता  

काली रात में ठंडक उसके शरीर पर रहती है  
सपनों का वातावरण गवाह बनता है  
अदृश्य कहानियाँ फैलती हैं हर ओर  
अकेले सफर के माध्यम से दुनिया रहस्य जानती है


जी आर कवियुर 
08 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )

Thursday, January 8, 2026

इतना क़रीब ( ग़ज़ल)

इतना क़रीब ( ग़ज़ल)

इतना क़रीब आ जाओ, दिल में और जगह ही नहीं  
अब और इंतज़ार का, दिल में कोई सब्र ही नहीं  

तेरी ख़ामोश निगाहों ने जो कहा एक पल में  
वो हज़ारों ही लफ़्ज़ों में भी असर ही नहीं  

रात भर जागता रहता है तेरा ख़याल यहाँ  
नींद आती तो है लेकिन उसमें सहर ही नहीं  

हमने चाहा था सुकूनों का कोई साया मिले  
इश्क़ निकला तो वहाँ दर्द का घर ही नहीं  

तेरी मौजूदगी ही अब मेरी पहचान बने  
तेरे बिन इस ज़माने में मेरा सर ही नहीं  

जी आर कहे ये ग़ज़ल भी तुझे सौंप दी आज  
तेरे सिवा अब किसी और पे नज़र ही नहीं

जी आर कवियुर 
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)


Wednesday, January 7, 2026

तेरे साथ (ग़ज़ल)

 तेरे साथ (ग़ज़ल)

मैंने देखे थे वो दिन बीते तेरे साथ,
मौक़ा फिर नहीं आएगा क्या तेरे साथ (x2)

ख़ामोशी ने भी सीखा है मुस्कुराना,
जब से दिल ने कुछ कहा तेरे साथ (x2)

हर एक दर्द को आदत सी हो गई है,
रहने लगा हूँ बेख़ौफ़ सा तेरे साथ (x2)

तन्हा रातों ने पूछा कई दफ़ा मुझसे,
क्यों सुकून मिलता है सिर्फ़ तेरे साथ (x2)

वक़्त की गर्द में खो जाएँगी सब राहें,
नाम रह जाएगा बस जुड़ा तेरे साथ (x2)

जी आर कहता है आईना देखकर अक्सर,
मैं भी बेहतर हुआ हूँ थोड़ा तेरे साथ (x2)

जी आर कवियुर 
06 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Tuesday, January 6, 2026

बस छोड़ दो

बस छोड़ दो

जब बारिश शुरू हो जाए  
और आसमान स़लेटा लगे  
जब शब्द खो जाएँ  
जो तुम्हें चाहिए थे

एक साँस लो, प्रिय, और छोड़ दो  
कभी-कभी बस यही करना ही पर्याप्त है

ऊपर उठो, बस छोड़ दो  
समुद्र के पार शांति है  
घाव भरेंगे, दिल ठीक होंगे  
समय दिखाएगा क्या होना है —
बस छोड़ दो

जब रात लंबी और ठंडी लगे  
और साहस थक जाए  
हवा के साथ बह जाने दो  
जो तुम्हारा है वही रहेगा, जो नहीं है चला जाएगा

जब रास्ता दूर और विस्तृत लगे  
और शक्ति अंदर से चली गई लगे  
अपनी आँखें बंद करो, हवा के साथ बहो  
स्मृतियों में शांति पाओ

ऊपर उठो, बस छोड़ दो  
समुद्र के पार शांति है  
घाव भरेंगे, दिल ठीक होंगे  
समय दिखाएगा क्या होना है —
बस छोड़ दो

हर तूफ़ान कभी टूट जाएगा  
हर आँसू अपना रास्ता पाएगा  
ख़ामोशी में तुम देखोगे  
छोड़ देने में सुकून है

ऊपर उठो, बस छोड़ दो  
थके हुए मन को आज़ाद करो  
सपने लौटेंगे, दिल फिर विश्वास करेगा  
प्रकाश पत्तियों के बीच तुम्हें ढूँढेगा —
बस छोड़ दो

जी आर कवियुर 
06 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

एक साँस काफी है ( गीत)

एक साँस काफी है ( गीत)

एक साँस काफी है
ज़िंदा होने को
एक आवाज़ काफी है
आसमान छूने को

आज समझ में आया
जीने का मतलब क्या है
ख़ामोशी भी
अब गीत गाती है

तू देखे जब
बादल झुक जाते हैं
दिल के अँधेरे
रोशनी सीख जाते हैं

बिन पंखों के भी
उड़ना आ गया
ज़मीन पर रहकर
आसमान मिल गया

एक साँस काफी है
दिल जलाने को
एक एहसास काफी है
ख़ुद को पाने को

तू दिन को जब
दुआ दे देता है
हर बोझ मेरा
हवा बन जाता है

जो डर ठहर गए थे
मन के कोने में
चुपचाप खो जाते हैं
वक़्त के साए में

आज भी कल भी
यह साँस चलेगी
तेरे साथ होने की
उम्मीद जलेगी

जी आर कवियुर 
06 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

बुखार आए दिन (कविता)

बुखार आए दिन (कविता)

हँसी फैलती है चारों ओर,
कुछ दर्द धीरे-धीरे दूर जाते हैं,
पंख फैलाकर उड़ जाते हैं,
होठों पर धीरे-धीरे खिलते हैं।

मन की थकान दूर करने के लिए,
चाहे चित्रित रंगों में हो,
चित्र आता और चला जाता है,
वह चित्र बनाने वाली है।

बुखार आने पर भी,
वह नहीं छोड़ती, मेरी कविता।

चाँदनी आती है और दिन की छाया मिटाती है,
चंदन की खुशबू वाले अक्षर,
चित्रित तितलियों की तरह उड़ते और पंख फैलाते हैं —
क्या यह हँसी कभी खत्म होगी? पता नहीं।

जी आर कवियूर
05 01 2026
(टोरंटो, कनाडा)

Sunday, January 4, 2026

तेरी रहमत” (सूफी ग़ज़ल)

तेरी रहमत” (सूफी ग़ज़ल)

तेरी इबादत में जो सुकूँ मिला, वो कहीं और नहीं  
सज्दे में झुक कर समझा, तू मुझसे दूर नहीं  

हर साँस में तेरा नाम, हर धड़कन तेरा ज़िक्र  
मैं खुद को भूल भी जाऊँ, पर तुझे भूलूँ नहीं  

मंदिर हो या मस्जिद, हर दर पे तू ही तू  
पर्दे बहुत हैं लोगों में, पर तू कहीं छुपा नहीं  

नफ़्स की धूप में जलकर, रूह ने ये जाना  
जिसे मैं ढूँढता फिरा, वो मुझसे जुदा नहीं  

इश्क़ की राह में जब खुद को मिटाया मैंने  
तभी समझ आया कि यह सौदा कोई घाटा नहीं  

जी आर कहे, मैं हूँ तो बस तेरी रहमत से  
वरना इस ख़ाक में ऐसा कोई हुनर था नहीं


जी आर कवियुर 
04 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

शब्दों से दूर समय (गीत)

शब्दों से दूर समय (गीत)

आ… हूं…  
हूं… आ… हूं…

कहे बिना बीत गया समय  
मौन में बहते अनकहे नयन  
जन्म न ले सके वे पल  
आज भी दिल में थरथराते हैं  

कहे बिना बीत गया समय  
बिन शब्दों के बंधे हुए दिन  

बार-बार सोचा, कई बार मन में  
छुपा रखा ख्वाब, अंदर ही अंदर  
जैसे उड़ गए शब्द दूर  
और छूट गए कहीं अधूरे  

थामने की कोशिश करता हूं  
काँपते मन का दर्द  
टुकड़े चमकते और गायब होते  
स्मृतियाँ आँसू बनकर बहती हैं  

कहे बिना बीत गया समय  
मौन में बहते अनकहे नयन  

धीरे-धीरे कदम बढ़ते हैं  
समय आगे बढ़ता है  
भूलों को सहेजते हुए  
प्रार्थनाएँ दिल में जागती हैं  

पितृ देवताओं को याद किया  
शांत मन, हृदय को सुकून मिला  
अनकहे नयन की यादें  
साया बनकर साथ चलती हैं  

कहे बिना बीत गया समय…  
अनकहे नयन के साथ…

जी आर कवियुर 
04 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

अकेले विचार – 130

अकेले विचार – 130


पुरानी राहों के कदमों पर ठोकर मत खाओ  
वे केवल सबक थे, सज़ा नहीं  

विचार आँखों में खिलते हैं  
ईश्वर की दिशा निर्णायक है  

सपने छाया में चमकते हैं  
वास्तविकता को मन में भरो  

रास्तों से सीख हासिल करो  
बाधाओं को पार करके आगे बढ़ो  

हर कदम में आत्मा को शक्ति मिलती है  
जीत तेज़ी में नहीं, सतर्कता में है  

विश्वास अडिग रहता है  
समय के अनुभव बदलाव लाते हैं

जी आर कवियुर 
04 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

नैनों का जादुई नशा ( ग़ज़ल)

नैनों का जादुई नशा ( ग़ज़ल)

तेरे नैनों ने कर दिया मुझको जादुई नशा
तन्हाई ने दिल को भी कर दिया जादुई नशा

ख़ामोश रात ने भी पी लिया तेरी यादों का नशा
हर धड़कन ने ओढ़ लिया धीरे-धीरे जादुई नशा

लबों पे आकर ठहर गई बात, आँखों ने सब कह दिया
बिन कहे ही साँसों में घुलता रहा जादुई नशा

तेरी मौजूदगी का आलम क्या कहूँ ऐ हमनशीं
होश में रहकर भी लगने लगा बेख़ुदी सा नशा

वक़्त की रेखाएँ धुँधली, मंज़िलें भी खो गईं
तेरे एहसासों ने मुझ पर कर दिया पूरा नशा

जी आर लिखता रहा शेर, मगर कलम भी चुप न रही
हर अक्षर में उतरता गया तेरा जादुई नशा

जी आर कवियुर 
04 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

जय जय हनुमन्ता (भक्ति गीत)

जय जय हनुमन्ता (भक्ति गीत)

जय जय हनुमन्ता
रामदूत पवनसुत
तेरे चरणों में
गाता भजन मैं रामदूत का

अंजना के पुत्र वीर
अग्नि जैसी शक्ति वाले
लंका हिलाने वाले
लक्ष्मण प्राणदाता
(x2)

जय जय हनुमन्ता
रामदूत पवनसुत
तेरे चरणों में
गाता भजन मैं रामदूत का

राम नाम हृदय में बसे
सदा जलते दीप समान
भक्तों में महावीर
देवताओं में पूज्य
(x2)

जय जय हनुमन्ता
रामदूत पवनसुत
तेरे चरणों में
गाता भजन मैं रामदूत का

पूंछ में अग्नि बांधी
अहंकार को जलाया
अहं त्यागा महान बलवान
आश्रितों के प्रिय मूर्ति
(x2)

जय जय हनुमन्ता
रामदूत पवनसुत
तेरे चरणों में
गाता भजन मैं रामदूत का

अशोक वन में जाकर
रामकथा सुनाई
सिता के संकट हरे
शांत स्वरूप सुंदर
(x2)

जय जय हनुमन्ता
रामदूत पवनसुत
तेरे चरणों में
गाता भजन मैं रामदूत का

राम नाम जपते हुए
शरण लेने वालों को शक्ति दें
महावीर ब्रह्मचारी
जय जय हनुमान जी पाही पाही
(x2)

जय जय हनुमन्ता
रामदूत पवनसुत
तेरे चरणों में
गाता भजन मैं रामदूत का 

जी आर कवियुर 
03 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

क्या करवाता है ( ग़ज़ल)

क्या करवाता है ( ग़ज़ल)


ये दिल मुझसे क्या क्या करवाता है  
धड़कनों की राह में मुश्किल क्या करवाता है (x2)  

हर ख्वाब में तेरा नाम मैं पुकारता हूँ  
तन्हाई में भी तुझे महसूस करवाता है (x2)  

रात की चुप्प में तेरी यादें आती हैं  
हर आँसू को मेरे हँसी में बदलवाता है (x2)  

मौसम बदलते हैं मगर असर वही रहता है  
हवा भी जैसे मुझसे सवाल करवाता है (x2)  

दिल की किताब में तेरे इश्क़ के लफ़्ज़ लिखे हैं  
हर पन्ने को जी आर तुझसे जोड़वाता है (x2)

जी आर कवियुर 
03 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

Friday, January 2, 2026

“तेरे लिए” ( ग़ज़ल)

“तेरे लिए” ( ग़ज़ल)

किस कदर मैं जी रहा हूँ तेरे लिए
जिस्म और जान से जीता हूँ तेरे लिए

तेरी हर बात में ढूँढा है अपना मंज़िल
तेरी हर याद में खो गया हूँ तेरे लिए

चाँदनी रातें भी अब तुझसे ही रोशन हैं
तारों की छांव में सोया हूँ तेरे लिए

धड़कनों में बस गई है तेरी ही खुशबू
हर साँस में महसूस किया हूँ तेरे लिए

मौत भी आए तो डरता नहीं मैं अब
इस दिल को सजाया है मैंने तेरे लिए

जी आर की दुआ यही है रब से
सफर ये सजा है हमने तेरे लिए

जी आर कवियुर 
02 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

ग़म ही करार (ग़ज़ल)

ग़म ही करार (ग़ज़ल)

तेरे ग़म में ग़ज़ल गाना ही करार है
क़ाफ़िया-रदीफ़ ढूँढना भी अब करार है X(2)

रात की खामोशी में तेरी यादें मुस्कुराईं
हर लफ़्ज़ में तेरी बातों का ही करार है X(2)

दिल के हर कोने में तेरी तस्वीर बसी है
तेरे बिना इस दिल का कोई ही करार है X(2)

टूटे हुए अरमानों को सजाने की कोशिश
तेरी याद में ही इस दिल का ही करार है X(2)

मंज़िलों से नहीं डरते, राहें चाहे कठिन हों
हर मोड़ पर तेरे नाम का ही करार है X(2)

जी आर कहे, किस्मत से अब शिकायत नहीं
सांसों की हर धड़कन में तेरे नाम का ही करार है X(2)

जी आर कवियुर 
02 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

तेरा नाम ही सही (ग़ज़ल )

तेरा नाम ही सही (ग़ज़ल )

जीने की वजह ही तेरा प्यारा नाम ही सही
इस दिल की महफ़िल में तेरी याद ही सही

तू साथ न हो तो क्या, तेरी ख़ुशबू है क़रीब
सूनी सी रातों में बस तेरा एहसास ही सही

हमने तो हर मोड़ पे तुझको ही चाहा है
मंज़िल न सही, राहों में तेरा ख़्वाब ही सही

टूटे हुए लफ़्ज़ों से क्या शिकवा करें अब
आँखों में ठहरा हुआ इक सैलाब ही सही

किस बात का ग़म है जो तू मिला नहीं
इस उम्र के क़िस्सों में तेरा नाम ही सही

जी आर कहे, मुक़द्दर से शिकवा नहीं अब
सांसों की हर धड़कन में तेरा नाम ही सही

जी आर कवियुर 
02 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

Thursday, January 1, 2026

मौन के अक्षर (ग़ज़ल)

मौन के अक्षर (ग़ज़ल)

मौन के अक्षर टूटे, दिल से सदा आई है  
वक़्त आ पहुँचा है अब, बात जुबाँ पर आई है  

मीठा दर्द अब तल्ख़ हुआ, खामोशी भी रो पड़ी  
जो लबों तक ना आया, वही बात सताई है  

यादों की धूप जलती रही, रात सुलगती रही  
हर एक ख़ामोश साँस ने, इक आग सुलगाई है  

आँखों की चमक फीकी पड़ी, ख़्वाब भी थक से गए  
सीने में दबा लावा, आज टूट के बह आई है  

पहाड़ों सा जो सब्र था, वो भी अब पिघल गया  
दिल कहता है बस इतना, सहने की सीमा आई है  

जी आर कहे किससे अब, इस जन्म की ये पीड़ा  
वक़्त आ पहुँचा है अब, सच ने राह दिखाई है

जी आर कवियुर 
01 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

साँसों से पहले” (ग़ज़ल )

साँसों से पहले” (ग़ज़ल )

मेरी साँसें थमने से पहले
दिल की धड़कन रुकने से पहले

तेरी यादों की खुशबू छूने से पहले
गुज़रती हवा में तेरा नाम लेने से पहले

चाँदनी भी शरमा जाए तेरी तस्वीर देखकर
सितारों की चुप्पी टूटने से पहले

दिल ने जो अरमान रखे हैं तेरे लिए
वो फलक पर लिखने से पहले

तेरी मोहब्बत के नग़्मे गुनगुनाने से पहले
आँखों ने ये सब कह देने से पहले

जी आर की मोहब्बत में जो खो गए,
हमने तो दिल की हसरतों को ढूँढ लिया

जी आर कवियुर 
30 12 2025 
( कनाडा, टोरंटो)

नए संसार के लिए प्रार्थना

नए संसार के लिए प्रार्थना

धरती पर शांति खिल जाए  
युद्धों की आवाज़ थम जाए  
आँसुओं की जगह  
हर चेहरे पर मुस्कान सज जाए  

भूखे पेटों में  
अन्न भर जाए  
सूने बर्तन  
भर-भर कर सज जाए  

गरीबी रास्ता बदल ले  
ज़िंदगी आगे बढ़ जाए  
मेहनत के हर दाने से  
कल की उम्मीद जग जाए  

सरहदें दीवार न बनें  
पुल बनकर जुड़ जाएँ  
देश और मज़हब से ऊपर  
इंसान, इंसान बन जाए  

नफ़रत धीरे मिट जाए  
इंसानियत ऊँची उठ जाए  
पहले जीना हर कोई सीखे  
फिर प्यार करना आ जाए  

यह धरती  
एक परिवार बन जाए  
अन्न और शांति  
सबको बराबर मिल जाए  

“लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु  
ॐ शांति शांति शांति”

जी आर कवियुर 
01 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)