भोर कोहरे में छिपी रही,
राहें चुपचाप प्रतीक्षा करती रहीं,
दृश्य धुंधली छाया में सोए रहे,
मन प्रकाश की खोज में भटकता रहा।
समीर ने धीरे से परदा हटाया,
सूर्य ने स्वर्णिम किरणें बिखेरीं,
पर्वत मुस्कान के साथ दिखाई दिए,
प्रकृति ने नई साँस भर ली।
संदेह दूर कहीं विलीन हो गया,
साहस ने सही दिशा पहचान ली,
आशा हृदय में फिर उदित हुई,
जीवन स्पष्टता बनकर खिल उठा।
जी आर कवियुर
05 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)
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