Friday, July 31, 2026

राख के नीचे की ऊष्मा

राख के नीचे की ऊष्मा

जब लपटें रात में शांत हो गईं,
राख मौन प्रतीक्षा करती रही।
जिस अग्नि को बुझा हुआ समझा गया,
उसकी साँस अब भी भीतर जीवित थी।

हानि की लंबी राहों पर
आशा कभी नहीं डगमगाई।
जहाँ पीड़ा राख बनकर बिखरी,
वहीं जीवन फिर अंकुरित होना चाहता था।

समय ने धीरे से कहा—
अंत वास्तव में अंत नहीं होता।
कभी-कभी एक छोटा-सा स्पर्श ही
प्रकाश को फिर जन्म देने के लिए पर्याप्त होता है।

जी आर कवियुर 
30 07 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

No comments:

Post a Comment