बादल दूर कहीं बह गए,
बारिश की बूँदें स्मृति बन गईं,
पत्ते चुपचाप प्रतीक्षा करते रहे,
धरती आकाश को निहारती रही।
फूलों ने अपनी सुगंध सँभाल रखी,
नदियाँ अपना गीत न भूलीं,
समीर पुरानी कथाएँ सुनाती रही,
मन बीते पलों को खोजता रहा।
बारिश सचमुच खोई नहीं थी,
जीवन फिर कोपलों में मुस्कुराया,
जब स्मृतियाँ नमी बनकर रहीं,
आशा फिर वर्षा बनकर लौट आई।
जी आर कवियुर
10 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)
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