Sunday, July 12, 2026

धरती का हृदय

धरती का हृदय

धरती की गोद से जीवन अंकुरित हुआ,
जड़ें चुपचाप फैलती रहीं,
नदियाँ प्रेम बनकर बहती रहीं,
हवाएँ प्राण बनकर भरती रहीं।

वृक्षों ने अपनी छाया में समेट लिया,
पक्षियों ने भोर का गीत सुनाया,
फूलों ने रंगों से मुस्कान बिखेरी,
प्रकृति माँ बनकर स्नेह लुटाती रही।

समझ आया कि हृदय धरती का है,
करुणा उसकी हर धड़कन बन गई,
प्रेम ने समस्त जीवन को जोड़ दिया,
संसार एक परिवार बनकर खिल उठा।


जी आर कवियुर 
10 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)

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