बादल हाथों में हाथ डाले खड़े थे,
आकाश ने अपना द्वार खोल दिया,
हवाओं ने यात्रा को पुकारा,
मन ने अपने पंख फैला दिए।
सूर्य ने स्वर्णिम प्रकाश बिखेरा,
इंद्रधनुष ने दिशाएँ दिखाईं,
आशा एक पथ बनकर फैल गई,
साहस हर कदम का मार्गदर्शक बना।
मार्ग आकाश में नहीं था,
वह हृदय में खिल चुका था,
सपनों ने मंज़िल को गले लगाया,
जीवन अनंत की ओर चलता रहा।
जी आर कवियुर
10 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)
No comments:
Post a Comment