Friday, July 31, 2026

शंख के भीतर का सागर

शंख के भीतर का सागर

जब लहरें दूर क्षितिज में विलीन हो गईं,
एक शंख ने नमक की स्मृति सँजो ली।
हवा की अनकही कहानियाँ
उसकी घुमावदार परतों में छिपी रहीं।

जो यात्राएँ किनारे तक पहुँच न सकीं,
उनकी प्रतिध्वनियाँ
उसी में गूँजती रहीं।
समय की भूली हुई धुन-सी
भीतर एक अनुनाद जाग उठा।

मौन ने धीरे से बताया—
सत्य बाहर नहीं होता।
जिस क्षण मैंने स्वयं को सुनना सीखा,
पूरा ब्रह्मांड मेरे भीतर प्रकाशित हो उठा।

जी आर कवियुर 
30 07 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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