डाली पर बस एक पत्ता,
हवा के संग झूम रहा था।
झरने का समय आ पहुँचा,
फिर भी आशा थामे रहा।
जब प्रभात की स्वर्णिम किरणों ने
उसकी हरियाली को सहलाया,
उसका गिरना भी
जीवन-वीणा का एक स्वर बन गया।
जब समय, कवि बनकर मुस्कराया,
ऋतुओं ने अपना ताल बदल लिया।
अंततः पत्ते ने यह सत्य कहा—
हर अंत एक नई शुरुआत है।
जी आर कवियुर
30 07 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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