यादों में कभी, ख़्वाबों में अक्सर तुम मिलती रही।
तन्हाइयों की धूप में जब-जब मैं जलता रहा,
बरगद की ठंडी छाँव बनकर तुम मिलती रही।
महफ़िल में सबके सामने हँसता रहा मैं मगर,
आँखों की भीगी ख़ामुशी में तुम मिलती रही।
हर मोड़ पर वक़्त ने मुझको बहुत आज़माया मगर,
हिम्मत की एक रौशनी बनकर तुम मिलती रही।
दुनिया ने लाख चाहा कि तुझको भुला दूँ मगर,
दिल की हर एक धड़कन में तुम मिलती रही।
'जी आर' ने लिख दी दास्ताँ अश्कों की हर एक सतर,
हर एक ग़ज़ल की बंदिशों में तुम मिलती रही।
GR kaviyoor
21 07 2026
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