राहें मौन होकर प्रतीक्षा करती रहीं,
पदचिह्न मिट्टी में विलीन हो गए,
केवल उन लम्हों की परछाइयाँ,
जो कभी लौटकर नहीं आए,
मेरे साथ चलती रहीं।
जब दूरियाँ बिना नाम पुकारने लगीं,
मन भीतर की यात्रा पर निकल पड़ा,
जिन उत्तरों की खोज थी,
वे बाहर कहीं नहीं थे—
वे हृदय की गहराइयों में
चिरकाल से विश्राम कर रहे थे।
भूली हुई दिशा कहीं और नहीं थी,
वह अपने ही विस्मृत अस्तित्व की राह थी।
जिस क्षण मैंने साहस से एक सत्य स्वीकार किया,
जीवन स्वयं मेरी मंज़िल बन गया।
जी आर कवियुर
30 07 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)
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