लहरें आकर तट को सहलाती रहीं,
रेत के कण अनगिनत कथाएँ सँजोए रहे,
सीपियों ने मौन को अपने भीतर समेट लिया,
सागर दूर क्षितिज को निहारता रहा।
साँझ ने लालिमा का वस्त्र ओढ़ा,
आकाश ने स्मृतियाँ बिखेर दीं,
समीर ने धीमे से मन को छुआ,
हृदय हर पल को महसूस करता रहा।
एकांत अब शून्यता न रहा,
आशा एक सच्चा साथी बन गई,
जब स्वयं को पहचान लिया,
जीवन लहरों की तरह मुस्कुराया।
जी आर कवियुर
05 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)
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