रात शांत होकर खिल उठी,
अनंत आकाश खुला पड़ा था,
तारे अपनी आँखें खोले रहे,
धरती शांति से सोती रही।
चाँद ने चाँदी-सी रोशनी बिखेरी,
समीर लोरी गुनगुनाती रही,
अँधेरा भय को भूल गया,
आशा मन में जगमगाती रही।
पहरे पर केवल तारे ही न थे,
विश्वास भी राह को रोशन करता रहा,
हर रात एक सत्य कहती रही—
प्रकाश कभी सचमुच दूर नहीं जाता।
जी आर कवियुर
10 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)
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