Sunday, July 12, 2026

जो नदी बहती नहीं


जो नदी बहती नहीं

नदी मौन होकर ठहर गई,
लहरों ने अपनी साँस छिपा ली,
आकाश ने उसमें अपना चेहरा देखा,
वृक्ष पहरेदार बनकर खड़े रहे।

समीर ने तट को धीरे से छुआ,
पत्तों ने रहस्य आपस में बाँटे,
सीपियों ने जैसे मोती सँभाल रखे,
मौन ने अर्थों को सुरक्षित रखा।

बहाव वास्तव में रुका नहीं था,
वह भीतर की यात्रा बन गया,
जब शांति ने हृदय में जड़ें जमाईं,
जीवन महासागर-सा गर्ज उठा।

जी आर कवियुर 
10 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)

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