घने वर्षा-मेघ आकाश पर छा गए,
वर्षा की बूँदों ने धरती को छू लिया,
हवाओं में भीगी मिट्टी की सुगंध भर गई,
धरती ने नया जीवन साँसों में भर लिया।
हर घर में दीपक जगमगा उठे,
राम-नाम मधुर स्वर में गूँज उठा,
प्राचीन ताड़पत्रों में ज्ञान फिर खिल उठा,
मन भक्ति से भीग गया।
समझ आया कि कर्किडकम दुःख का महीना नहीं,
करुणा जीवन की रक्षा करती रही,
जब विश्वास ने राह को प्रकाशित किया,
आशा फिर से अंकुरित हो उठी।
जी आर कवियुर
14 07 2026
(तिरुवल्ला,कवियुर)
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