Saturday, July 18, 2026

दौलत ( ग़ज़ल )

दौलत ( ग़ज़ल )
दौलत मिली तो हर शख़्स अपना-सा लगा,
खाली जेब थी तो हर रिश्ता सपना-सा लगा।

चेहरों पे मुस्कानों का मेला तो बहुत था,
मतलब निकला तो हर आईना धुँधला-सा लगा।

दौलत के लिए लोग कहाँ तक उतर गए,
हर मोड़ पे ईमान भी सस्ता-सा लगा।

जिस दिन से तिजोरी को ख़ुदा मान लिया,
इंसान का हर ख़्वाब भी सौदा-सा लगा।

दौलत ने जो दीवार उठाई थी दरमियाँ,
अपना ही घर हमें फिर बेगाना-सा लगा।

सिक्कों की खनक ने ये कैसा जादू किया,
हर शख़्स हमें अपना ख़रीदार-सा लगा।

दौलत के तराज़ू में तौले गए सभी,
इंसान भी बाज़ार का सामान-सा लगा।

'जी आर' ने सच कह दिया महफ़िल के बीच में,
सच बोलना भी आज बड़ा ख़तरा-सा लगा।

जी आर कवियुर 
15 07 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

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