Friday, July 31, 2026

दर्पण की स्मृति

दर्पण की स्मृति

अनगिनत चेहरे आते-जाते रहे,
दर्पण मौन खड़ा रहा।
अनकही भावनाओं को
उसने अपनी चमक में सँजोए रखा।

मुस्कान से छुए हुए क्षण,
आँसुओं से भीगे हुए पल—
समय उन्हें मिटा न सका;
वे हर प्रतिबिंब के पीछे जीवित रहे।

मौन ने धीरे से सिखाया—
चेहरा ही सत्य नहीं।
जिस क्षण मैंने स्वयं को पहचाना,
आत्मा प्रकाश बनकर खिल उठी।

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