Saturday, February 21, 2026

चट्टानों में यादें

 चट्टानों में यादें

चट्टानों की मौनता निस्सहाय कथाएँ कहती है,  
समय के स्पर्श में यादें खिलती हैं।  
पीटर, तुम एक चट्टान बन जाते हो, हृदय में अडिग खड़े,  
जीवन की कठिनाइयाँ और शांति मिलकर एक हो जाती हैं।  

पत्थरों के बीच गिरे फूल,  
जीवन की बाहरी झलकियाँ प्रकट करते हैं।  
जैसे स्वामी विवेकानंद ने कन्याकुमारी की चट्टान पर अपने राष्ट्र का दर्शन पाया,
भारत का विशाल रूप मन में उद्घाटित होता है।

मधुरता, दुःख और आनंद सब सुरक्षित हैं,  
चट्टानों में यादें मौन रूप में जीवित रहती हैं।  
आत्मा की स्पंदनाएँ हृदय में प्रतिध्वनित होती हैं,  
यादें समय की धारा में यात्रा करती हैं।

जी आर कवियुर 
21 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

पयार का सफर ( सूफी ग़ज़ल )

 पयार का सफर ( सूफी ग़ज़ल )




हर पल तेरी यादों में खोया,  
दिल मेरा तेरी रहमत में खोया।  

मयख़ाने की खुशबू में बहकता,  
रूह मेरी तेरे साये में खोया।  

दरवेश की बातें सुनते-सुनते,  
हर जज़्बात तेरी मौज में खोया।  

चाँदनी रात में जब तेरा नाम लिया,  
हर सवेरा तेरी रोशनी में खोया।  

साक़ी की प्याली में ढूँढा सुकून,  
हर पल मेरा तेरी मेहरबानी में खोया।  

माया के इस संसार में तुझको पाया,  
हर दिल मेरा तेरे इश्क़ में खोया।  

जी आर की दुआ है ये दिल सदा महकता रहे,  
तेरे रहमत और इश्क़ की गहराई में खोया।

जी आर कवियुर 
21 02 2026
( कनाडा, टोरंटो)

फोटोग्राफर

 फोटोग्राफर


कितनी अनकही पीड़ा के साथ
वे चलते हैं —
कैमरे की खुली आँख लिए,
मंचों और त्योहारों के पार,
जन्म और मृत्यु के बीच,
शादियों और रस्मों के मध्य —
चुपचाप सब कुछ पार करते हुए।

प्रकृति की कठोर विकृतियाँ भी
वे सह लेते हैं,
कल की स्मृतियाँ
दुनिया को सौंपते हुए।

हम उनके दर्द को नहीं जानते,
बस उनकी मुस्कान देखते हैं।
एक माप भूख के लिए,
जीवन की निरंतरता के लिए,
वे आगे बढ़ते रहते हैं।

जो जीवन का सम्पूर्ण भार
अपने सीने पर उठाए चलते हैं,
उनके लिए
थोड़ा-सा मौन रखना —
यही मेरा विश्वास है।

 जी आर कवियुर 
20 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)





Thursday, February 19, 2026

बादलों की छाया

 बादलों की छाया

सफ़ेद बादल आकाश में फैलते हैं,  
हवा की मौजूदगी उंगलियों की तरह बहती है।  
छायाओं की कोमलता में आँखें खिलती हैं,  
हृदय आकाश की ओर उठता है।  

नदी की सतह पर प्रतिबिंब चमकते हैं,  
बरसात की बूँदें मन में कविताएँ गुनगुनाती हैं।  
गर्मी का समय छुपकर मूक हो जाता है,  
पक्षियों के गीत गलियों में बहते हैं।  

प्रकृति की धुनें हृदय को छूती हैं,  
रंग बादलों के बीच से गुजरते हैं।  
स्मृतियों की छाया फिर से जागती है,  
बादलों की छाया हृदय में मुस्कुराती है।

जी आर कवियुर 
19 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अभी भी चढ़ना बाकी है (कवि और सिविल इंजीनियर के रूप में)

 
अभी भी चढ़ना बाकी है
(कवि और सिविल इंजीनियर के रूप में)




अब भी मैं एक विद्यार्थी हूँ —
धैर्य से रेखाएँ खींचता हूँ,
विनम्रता से सुधार करता हूँ,
अविस्मरणीय सपने रचता हूँ।

सिविल इंजीनियरिंग ने मेरे हाथ बनाए,
कविता ने मेरे हृदय को आकार दिया।

कल्पना — मेरी सच्ची इंजीनियरिंग है।
कविता — मेरी चढ़ाई का पेड़,
और मेरी प्यारी चाय की प्याली।

मैंने बहुत दूर की यात्रा की है,
फिर भी रास्ता आगे फैला हुआ है।

अभी भी पुल बनाने हैं,
कविताओं को जीवन देना है।

अनुभव मेरे साथ खड़ा है,
लेकिन जिज्ञासा आगे बढ़ती है।

जी आर कवियुर 
19 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)





Wednesday, February 18, 2026

यादों के आसमाँ में

 यादों के आसमाँ में


इस क़दर टूट चुके हैं हम तेरी याद में,

तेरी वफ़ा माँगते हैं हम भी तेरे सहारे में।


दिल को सुकूँ मिलता नहीं इस बेकरार रात में,

खोए से फिरते हैं हम तेरे ही ख़्वाब में।


तन्हाई के बादल छा गए दिल के आसमाँ में,

भीगते रहते हैं अरमाँ तेरे इंतज़ार में।


हर धड़कन पुकारे तेरा नाम ख़ामोशी में,

डूबते जाते हैं लम्हे तेरे एहसास में।


दुनिया ने भुला दिया हमें अपने हिसाब में,

हम आज भी ज़िंदा हैं तेरे ही ख़याल में।


रात भर जागते रहे तेरी ही चाहत में,

चाँद भी डूबता रहा मेरी निगाह में।


टूट कर चाहा तुझे हमने हर हाल में,

खुद को ही खो दिया तेरे ऐतबार में।


आँखों से गिर पड़े जो अश्क़ ख़ामोशी में,

डूबते रहे वो भी तेरे ही ख़याल में।


ज़ख़्म दिल के भर सके ना उम्र भर में,

बस दर्द ही मिलता रहा हर इम्तिहान में।


छोड़ कर भी तू गया तो क्या गया मुझसे,

साँसें अटकी रह गई तेरे ही नाम में।


तन्हाई के बादल छा गए दिल के आसमाँ में,

‘जी.आर.’ अब भी जी रहा है तेरी यादों में।



जी आर कवियुर 

16 02 2026

(कनाडा, टोरंटो)

भूल जाने की खामोशी

 भूल जाने की खामोशी

वह जो अपना नाम तक भूल गया
वह जो आँसुओं के साथ देखता है
अपनी प्यारी पत्नी का चेहरा
जानता या भूल जाता है, यूँ ही गुजरता है

समय और दिन धीरे-धीरे खो गए
एक भी याद बची नहीं किसी दिन की
साथी और दोस्त भी
पूछें तो वह भूल जाता है

अख़बार आने पर सबसे पहले
शब्द पहेली को भरता और खेलता
समय बीत जाता है, और वह जान नहीं पाता
मौन दिनों का सफ़र चलता रहता है

जी आर कवियुर 
16 02 2026
(कनाडा , टोरंटो)


Tuesday, February 17, 2026

यादों का समंदर (ग़ज़ल)

यादों का समंदर (ग़ज़ल)

अपना ही नाम जैसे वो भूल जाता है,
आँखों में अश्क लेकर वो मुस्कुराता है।

अपनी ही अहल-ए-वफ़ा का वो चेहरा देख कर,
पहचानता है कभी, कभी भूल जाता है।

गुज़रे हुए दिनों की कोई याद तक नहीं,
वक़्त का हर पन्ना हवा में उड़ जाता है।

अख़बार की पहेली को भरने का वो शौक़,
अब मौन रास्तों पे उसे छोड़ आता है।

दोस्त और हमसफ़र जो उसे याद आएँ भी,
इक पल में सारा नक़्शा ही बदल जाता है।

कल तुम भी इस भँवर में कहीं फँस न जाओ तुम,
किस्मत का ये समंदर सबको डराता है।

ये ज़िंदगी जीने का कोई और ढंग नहीं,
बस इक मर्ज़ है जो यादें चुराता है।

ग़ैर नहीं 'जीआर' ये खामोशी का सफ़र,
इंसान अपनी हस्ती से ही हार जाता है।

रचना: जी आर कवियूर 
16.02.2026
(कनाडा, टोरंटो)

यादों के आसमाँ में

 यादों के आसमाँ में

इस क़दर टूट चुके हैं हम तेरी याद में,
तेरी वफ़ा माँगते हैं हम भी तेरे सहारे में।

दिल को सुकूँ मिलता नहीं इस बेकरार रात में,
खोए से फिरते हैं हम तेरे ही ख़्वाब में।

तन्हाई के बादल छा गए दिल के आसमाँ में,
भीगते रहते हैं अरमाँ तेरे इंतज़ार में।

हर धड़कन पुकारे तेरा नाम ख़ामोशी में,
डूबते जाते हैं लम्हे तेरे एहसास में।

दुनिया ने भुला दिया हमें अपने हिसाब में,
हम आज भी ज़िंदा हैं तेरे ही ख़याल में।

रात भर जागते रहे तेरी ही चाहत में,
चाँद भी डूबता रहा मेरी निगाह में।

टूट कर चाहा तुझे हमने हर हाल में,
खुद को ही खो दिया तेरे ऐतबार में।

आँखों से गिर पड़े जो अश्क़ ख़ामोशी में,
डूबते रहे वो भी तेरे ही ख़याल में।

ज़ख़्म दिल के भर सके ना उम्र भर में,
बस दर्द ही मिलता रहा हर इम्तिहान में।

छोड़ कर भी तू गया तो क्या गया मुझसे,
साँसें अटकी रह गई तेरे ही नाम में।

तन्हाई के बादल छा गए दिल के आसमाँ में,
‘जी.आर.’ अब भी जी रहा है तेरी यादों में।


जी आर कवियुर 
16 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

चाँद सितारों के पार

 चाँद सितारों के पार



चाहे जितनी आँख मिचौली खेलो ऐ यार, आ गया हूँ  
तुझे ढूँढते ढूँढते चाँद सितारों के पार आ गया हूँ  

तू बादलों में छिपा रहा हर बार  
तेरी चाह में धरती से आकाश के पार आ गया हूँ  

तू समझा कोई पहुँच न पाए उस द्वार  
हर बंद रास्ते तोड़कर तेरे द्वार आ गया हूँ  

तेरी हँसी की खुशबू रही मेरे साथ हर बार  
उसी महक के सहारे तेरे घर के पार आ गया हूँ  

तेरी आँखों में बसा है मेरा सारा संसार  
उन्हीं नजरों की चमक में खुद को वार आ गया हूँ  

तेरे बिना सूना था जीवन का हर त्योहार  
तेरी एक मुस्कान से फिर बहार आ गया हूँ  

अब कहाँ छिपेगा मुझसे ऐ प्यार  
तेरी एक पुकार पर हर दीवार के पार आ गया हूँ  

जी आर भटका बहुत इस जग के संसार  
तेरी सच्ची मोहब्बत से खुद के पार आ गया हूँ

जी आर कवियुर 
16 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

तेरे ख्यालों में (ग़ज़ल)

तेरे ख्यालों में  (ग़ज़ल)

चाहतों की महफ़िल में  
खोजता रहूँ तेरे नैनों में  

नज़र जब नज़रों से मिले  
दिल की बात रह गई दिल में  

राज़-ए-राज़ तक रह गई  
ख़्वाब में मिले, ख़ामोशी में  

राहत से तनहाई बोल उठी  
मोह के रंग से बनी तेरी याद मन में  

हर धड़कन में बस गया तेरा नाम  
हवाओं में घुला, जैसे कोई पैग़ाम में  

हरदम डूब जाऊँ  
तेरे ख्यालों में — जी आर 

रहमत की क़ीमत (ग़ज़ल)

रहमत की क़ीमत (ग़ज़ल)




साँसों की क़ीमत पर तुझको पाया,
ख़ुशबू की क़ीमत पर तुझको पाया है।

क़िस्मत की हर क़ीमत पर तुझको पाया,
रहमत की हर क़ीमत पर तुझको पाया है।

चाँदों की हर सूरत पर तुझको पाया,
फूलों की हर रंगत पर तुझको पाया है।

भीगी हुई पलकों की ख़ामोशी में,
आँसू की क़ीमत पर तुझको पाया है।

हँसती हुई सुबह की हर किरण में,
रोशनी की क़ीमत पर तुझको पाया है।

रंगों की हर छटा में तेरा नाम पाया,
ज़िंदगी की क़ीमत पर तुझको पाया है।

जौहरी ही जानता है क़ीमत मोती की,
शायर ही जानता है ग़ज़ल की क़ीमत पर तुझको पाया है।

कहता है ‘जी आर’ ये दुनिया से,
रहमत की क़ीमत पर तुझको पाया है।

जी आर कवियुर 
15 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

“चाँद सितारे तेरे कदमों में” ( ग़ज़ल)

 
“चाँद सितारे तेरे कदमों में” ( ग़ज़ल)






चाँद सितारे तोड़कर तेरे कदमों में रख दूँगा
गर तू कह दे एक बार, मैं दुनिया भी छोड़ दूँगा

तेरी आँखों की चमक में ही मेरा उजाला है
तेरे बिन इस दिल को मैं किससे जोड़ लूँगा

रात तन्हा भी अगर हो, तेरी यादें साथ हों
उन अँधेरों को भी हँसकर मैं मोड़ लूँगा

तेरे होंठों की हँसी है मेरी हर धड़कन में
तेरे ग़म को भी मैं अपने दिल पे ओढ़ लूँगा

चाँद भी शर्मा गया तेरी सूरत की रोशनी से
उसकी महफ़िल से भी तुझको मैं तोड़ लूँगा

अगर तू साथ हो तो हर सफ़र आसान लगे
तेरे बिन हर खुशी से भी मैं मुँह मोड़ लूँगा

'जी आर' दिल से जो निकली है ये आवाज़ आज
तेरे लिए चाँद भी बाँहों में मैं जोड़ लूँगा

जी आर कवियुर 
14 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)



“बोलना तो चाहता था” ( ग़ज़ल)

“बोलना तो चाहता था” ( ग़ज़ल)




बोलना तो चाहता था, मगर कह न सका
आज यादों में तुझे फिर भी भुला न सका

दिल में अरमान कई पलते रहे चुपके से
सामने तू जो आया तो जता न सका

तेरी आँखों में जो ठहरा था उजाला कभी
उस उजाले को मैं दिल से मिटा न सका

वक़्त ने लाख सिखाया कि संभल जाऊँ मैं
तेरे जाने का मगर ग़म भुला न सका

रात तन्हाई की चुपचाप गुजरती ही रही
तेरा चेहरा मेरी नींदों से हटा न सका

अपने जज़्बात को अल्फ़ाज़ में ढालूँ कैसे
दिल की धड़कन को भी लब तक ला न सका

लोग कहते रहे आगे भी तो दुनिया है बहुत
मैं तेरी याद से रिश्ता तोड़ पा न सका

एक तस्वीर थी आँखों में बसी बरसों से
उसको चाहा भी तो दिल से गिरा न सका

साँस चलती रही लेकिन वो सुकूँ ना मिला
ज़ख़्म सीने का किसी से भी बता न सका

भीड़ में रह के भी तन्हा ही रहा हूँ हरदम
अपने अंदर का सन्नाटा सजा न सका

'जी आर' दिल की कहानी ही लिखता रहा
अपना ही हाल किसी को सुना न सका

जी आर कवियुर 
14 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Saturday, February 14, 2026

तुम्हारे लिए मेरी ग़ज़ल”

 तुम्हारे लिए मेरी ग़ज़ल”



प्यार की राहें बताऊँ तुम्हारे लिए
तुम्हारे बिना भी जिया मैंने तुम्हारे लिए

छाँव बनकर तुम जब आए मेरे दिल में
यादों की बारिश में गिरते हैं शब्द तुम्हारे लिए

आँसुओं के किनारे पार कर मैं जब पहुँचा
आँखों में चमकता रहा तुम्हारा प्यार तुम्हारे लिए

वक़्त की धार में तुम्हें देखा बिना छुपाए
हर पल मेरा चित्र उकेरा गया मेरे दिल में तुम्हारे लिए

सपनों की मुस्कान में तुम्हें खोजते हुए गिरा मैं
मन की ठंडी छाँव में मधुर गीत गाया मैंने तुम्हारे लिए

तुम बिन ये दुनिया सूनी लगती है
दिल का संगीत हमेशा गूंजता रहेगा तुम्हारे लिए

जी आर, पूरी तन्मयता से तुम्हें बुलाता हूँ
दिल का प्यार हमेशा गाता हूँ तुम्हारे लिए

जी आर कवियुर 
14 02 2026
(कनाडा , टोरंटो)

नज़रों के सामने (ग़ज़ल)

 नज़रों के सामने (ग़ज़ल)

आज भी और अभी भी नज़रों के सामने दिखाई देती हो,  
दुनिया रात-दिन एक सी है, हर जगह दिखाई देती हो।  

दिल की हर धड़कन में बस तुम्हारा नाम रहता है,  
मेरी हर साँस में तुम दिखाई देती हो।  

रातों की तन्हाई में जब याद तुम्हारी आती है,  
बंद आँखों में तुम दिखाई देती हो।  

इस भीड़ भरी दुनिया में कोई अपना सा नहीं लगता,  
मेरे हर एहसास में तुम दिखाई देती हो।  

मेरी हर दुआ में बस तुम्हारी ही बात होती है,  
मेरे हर ख्वाब में तुम दिखाई देती हो।  

'जी आर' के दिल की सच्ची सी ये कहानी है,  
मेरे हर शेर में तुम दिखाई देती हो।

जी आर कवियुर 
12 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Wednesday, February 11, 2026

विरह की बहारें (ग़ज़ल)

 विरह की बहारें (ग़ज़ल)



कितने ही वसंत गुज़र गई,
दिल से तेरी तस्वीर गुज़र गई।

दिन-रात यूँ ही ख़ामोश रहे हम,
और हर एक तदबीर गुज़र गई।

मौन में तुझे ढूँढता रहा दिल,
बिना जाने हर तक़दीर गुज़र गई।

विरह की आग सीने में जलती रही,
मीठी सी हर पीर गुज़र गई।

आँखों में ठहरे हुए आँसू बह निकले,
दिल की हर तासीर गुज़र गई।

सूक्ष्म सी यादों में जी रहा हूँ अब भी,
जी आर की ये तहरीर गुज़र गई।

जी आर कवियुर 
11 02 2026
( कनाडा, टोरंटो)

उनकी याद में (ग़ज़ल)

 उनकी याद में (ग़ज़ल)



आ जाओ फिर से, बीत सी उमर गई,  
कितने सावन आए, कितनी तन्हाई गुज़र गई।  

दिल की बातें छुपा कर बैठा मैं वहीं,  
तुम्हारी यादों में सारी उम्र गुज़र गई।  

वो पल कभी लौटेंगे, बस ख्वाबों में ही सही,  
तुम्हारी हँसी की खुशबू हर राह में गुज़र गई।  

छू ना सके हमको ये दूरी की दीवारें,  
मेरे अरमान तेरे बिना अधूरी गुज़र गई।  

रिश्तों की उलझनें, अनकही मोहब्बतें,  
हर उम्मीद बस तेरे इंतज़ार में गुज़र गई।  

जी आर कहते हैं कि तन्हाई, उनकी याद में बीती,  
सारी जिंदगी बस उनकी ख्याल में गुज़र गई।

जी आर कवियुर 
10 02 2026
( कनाडा , टोरंटो)


अतिजीवन

 अतिजीवन






पिघलती गर्मी में, मैं छाया की तरह खड़ा रहा,  
लुप्त ज्वाला में, मेरी आँखें नम न हुईं;  
जब हृदय के रक्त से महल बनाया गया,  
तुमने पत्थर फेंके, मेरी उपहासा करते हुए।  

घायल पक्षी गाता है अकेले गीत,  
दूसरों के कानों में अमृत बन जाता है;  
शाप की रेखाओं को प्रेम से मिटाता है,  
मेरे अडिग कलम की विजय यात्रा।  

दूरस्थ भूमि में खिलता है सम्मान,  
ज्ञान की चमक मेरे सीने में फैलती है;  
पंख काटने वाले झाड़ियों के बीच,  
मेरी कल्पनाशील कविता आकाश तक ऊँची उठती है।  

जी. आर. कवियूर  
09 02 2026  
(टोरंटो, कनाडा)

खुलें आँखें, जागे दिल ( सूफी ग़ज़ल)

 खुलें आँखें, जागे दिल ( सूफी ग़ज़ल)


हर पेड़, हर फूल, हर हवा में खुदा दिखे, खुलें आँखें, जागे दिल
रब खोल दे हमारी राहें, ताकि मन भी जागे, खुलें आँखें, जागे दिल

नदी की बहती धारा में छुपा जीवन का संदेश
फूलों की महक में बसा तेरा असीम प्यार, खुलें आँखें, जागे दिल

धरती की हर सांस में तेरी रहमत छुपी हुई
पंछियों की उड़ान में तेरा अहसास झलकता है, खुलें आँखें, जागे दिल

पेड़-पौधों से दुआ मांगें, पानी से आशीर्वाद लें
रब हमें सच दिखा, ताकि इंसान भी समझे, खुलें आँखें, जागे दिल

बादलों की छाया में छुपा अम्बर का रहस्य
धरती पे बरस जाए प्यार, खुलें आँखें, जागे दिल


यह जहाँ तुझसे सजा, हमने तुझसे प्यार किया
खुलें आँखें रब, इंसान के दिल में प्रकृति का घर किया, जी आर, खुलें आँखें, जागे दिल

जी आर कवियुर 
09 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Tuesday, February 10, 2026

एक शब्द जिसका अर्थ खो गया

 एक शब्द जिसका अर्थ खो गया


Picture made by Google Gemini 

रोज़मर्रा के छोटे-छोटे क्षणों में,  
तनाव और शांति के बीच,  
बिना सोच-समझ के निकल जाता है,  
सिर्फ आम शब्द बहते चले जाते हैं।  

रिश्तों में और सत्ता के सामने,  
यह आदत बनकर बार-बार गिरता है।  
संस्कार के नाम पर सिखाया गया,  
एक गहराई खो चुका शब्द।  

पहाड़ देखते रहते हैं, नदियाँ चुपचाप बहती हैं,  
घायल मिट्टी कुछ नहीं कहती,  
सब कुछ देने वाली धरती अंततः मौन रहकर  
“संहार रुद्रीनी” में बदल जाती है।  

जब साँस लेना मुश्किल हो जाएगा,  
और सब कुछ राख में बदल जाएगा,  
“सॉरी अथवा क्षम करें” आखिर में इंसान कहेगा,  
एक खाली शब्द, जिसका अर्थ खो गया।

जी आर कवियुर 
02 02 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

Monday, February 9, 2026

अकेले विचार – 134

 अकेले विचार – 134

नज़र में सब कुछ एक-सा लगता है  
पर स्पर्श ही सच्चाई बताता है  
सुनी-सुनाई बातें अक्सर भटकाती हैं  
अनुभव से ही सही समझ आती है  

चेहरे अपनी कहानी नहीं कहते  
शब्द भी कई बार धोखा देते हैं  
पास आने पर ही सच दिखता है  
दूरी से गलतफ़हमियाँ बढ़ती हैं  

समय इंसान को खुली किताब बनाता है  
हिम्मत दिल को पास जाना सिखाती है  
फैसला करने से पहले समझने की कोशिश करो  
इसी तरह इंसान को जाना जाता है

जी आर कवियुर 
07 02 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

चांदनी में हृदय

 चांदनी में हृदय

निशब्द रात में चाँद के प्रेमपूर्ण साए की खोज,  
हवा की कोमल ठंडक धीरे से स्पर्श करती है।  
तारों की चमक में आँखें झिलमिलाती हैं,  
हृदय-आकाश में मौन खिलता है।

पुरानी यादें पत्तों पर गिरती हैं,  
प्रेम की लय में ध्वनि दिखाई नहीं देती।  
चाँद की जादुई रोशनी मार्ग पर छाया डालती है,  
मन में आकांक्षाएँ धीरे-धीरे उठती हैं।

कोहरे में छुपा एक दृश्य मुस्कुराता है,  
तारे आँख मारकर कोमल हँसी उठाते हैं।  
अनजाने में, प्रेम हृदय में इकट्ठा होता है,  
आंतरिक आत्मा को प्रकाश से भर देता है।

जी आर कवियुर 
09 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

चमपक की रोशनी

 चमपक की रोशनी

कोमल कुसुम धूप में चमकते हैं,  
हल्की सुगंध धीरे-धीरे हवा में फैलती है।  
झूलते पत्तों में रोशनी नाचती है,  
प्रकृति की शांतिमा निश्चब्द में गाती है।

फूलों की कोमलता में आँखें कहानी कहती हैं,  
क्षण संध्या की भव्यता स्वीकारते हैं।  
हरे वृक्षों की ठंडी छाया में नरमी से बैठना,  
प्रेम की चमक वातावरण को नृत्य करने देती है।

चांदी-सुनहरी रोशनी मुस्कुराती है,  
प्रकृति का गीत निश्चब्द बहता है।  
जीवन के रहस्य मौन में झिलमिलाते हैं,  
चमपक की रोशनी हृदय को प्रकाशित करती है।

जी आर कवियुर 
09 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

हृदय की सहमति

 हृदय की सहमति

ठंडी शांति में एक सपना खिलता है,  
हृदय बोले सत्य की ओर बढ़ता है।  
स्मृतियों में गिरी मिठास चमकती है,  
आत्मा की निश्चब्द मुस्कान धीरे से गले लगाती है।

जहाँ रंग मिलते हैं, राहें प्रकट होती हैं,  
मौन की उंगली पर अनुभव झिलमिलाते हैं।  
प्रेम की गर्मी में क्षण बहते हैं,  
सपनों की लय में जीवन गाता है।

एकांत प्रेम धीरे-धीरे बढ़ता है,  
हृदय में बिना आवाज़ के प्रवेश करता है।  
मन सहमति देता है, हाथों में पकड़ बनाता है,  
प्रकृति से मिलकर असीम शांति भर देता है।

जी आर कवियुर 
09 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

ख़ामोशी की चोट (ग़ज़ल)

 ख़ामोशी की चोट (ग़ज़ल)




रात के रेगिस्तान में, खामोशी भी सोने लगी है
दुनिया के शोर में, खुद की राह खोने लगी है

दुःख के ठंडे रास्तों पर, उम्मीदें हिलने लगी हैं
नन्ही सी चुभनें भी, बड़े दिल को छूने लगी हैं

जो ऊँचाइयों पर बैठे, शोर में खोए रहे हैं
नीचे की सरगोशियाँ, सबसे भारी भी लगी हैं

चिट्ठी और हाथी की कहानी, सच में मिलती है
छोटी चुभनें भी, कभी सबसे बड़ी होती हैं

मौन में छिपे हुए सबक, कभी जोर से बोलते हैं
अनकहे अनुभव भी, सबसे गहरे उतरते हैं

जी आर, एक ही मुलाक़ात ने ये समझा दिया है
ख़ामोशी की चोट सबसे भारी भी है

जी आर कवियुर 
09 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

“तन्हाई का सितम (ग़ज़ल )

 “तन्हाई का सितम (ग़ज़ल )




और ये सितम अब और सहा जाए नहीं  
तन्हाई इस क़दर है कि जिया जाए नहीं  

टूट चुका हूँ मैं कई ख़्वाबों के बाद  
अब किसी वादे पे यक़ीं किया जाए नहीं  

महफ़िलों में भी सुकूँ ढूँढता फिरता हूँ  
ये दर्द-ए-दिल किसी से कहा जाए नहीं  

कलम और काग़ज़ की इबादत है बस  
और कोई दूसरा सहारा जाए नहीं  

हर रात बिखरता हूँ मैं यादों में यूँ  
सुबह होने तक खुद को समेटा जाए नहीं  

ग़म ने सिखाया है जी आर को लिखना तन्हा दिलसे  
वरना इस हाल में ग़ज़ल कहा जाए नहीं

जी आर कवियुर 
08 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Friday, February 6, 2026

अंजान रही है ( ग़ज़ल )

 अंजान रही है
 ( ग़ज़ल )




तुझको पता न था कि मेरी हालत क्या रही है
मेरी हर एक ख़ामोशी, तुझसे ही कहती रही है

नींदों में भी जागती आँखों की कहानी
हर एक धड़कन में, तेरी ही कमी रही है

शब्दों में छुपा दर्द, तू पढ़ न सका कभी
मेरी हर एक लिखावट, तुझसे ही बनती रही है

तेरे बिना भी जीना, मैंने सीख लिया मगर
हर मोड़ पर ये रूह, तुझसे ही लड़ती रही है

वक़्त ने सिखाया बहुत, सहना भी मुस्काना
फिर भी किसी मोड़ पर, आँखें नम होती रही है

जी आर कहे, तेरा प्यार मुझे मिला नहीं
फिर भी मेरी हर साँस में, तेरी ही गर्मी रही है

जी आर कवियुर 
05 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

आँसुओं की डगर पर (ग़ज़ल)

 आँसुओं की डगर पर (ग़ज़ल)©




आँसुओं की डगर पर, चोट खाता रहा मैं इश्क पर  
जिंदगी के हर दाव पर, बिगोता रहा इश्क पर  

हर ख्वाब मेरा टूटा, टूटता रहा मैं इश्क पर  
हर धड़कन में ढूँढता, अपना तूफ़ान इश्क पर  

रातों की तन्हाई में, रोता रहा मैं इश्क पर  
चाँद की चुप्प में गुम, खोता रहा मैं इश्क पर  

बेवफ़ा का जाल था, फँसता रहा मैं इश्क पर  
उम्मीद की लौ जलती, बुझता रहा मैं इश्क पर  

सपनों के उस पार भी, ढूँढता रहा मैं इश्क पर  
हकीकत की कसक में, घिरता रहा मैं इश्क पर  

जी आर की दास्ताँ यही, बयां करता रहा मैं इश्क पर  
हर साँस में ज़िंदा रहा, अपना जहां इश्क पर

जी आर कवियुर 
05 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

Wednesday, February 4, 2026

कनाडा में भूकंप — कवि की चेतावनी

 कनाडा में भूकंप — कवि की चेतावनी




ठंड की चादर में
जो थक कर सो रहे थे, उन्होंने नहीं जाना,
सर्व सहय एक पल के लिए कांपी,
भूतकाल से आया चेतावनी का संदेश।

सर्व सहय को उखाड़कर विकृत किया उसने,
घंटाघर आकाश को छूते हुए हिले,
नीचे ज़मीन धीरे-धीरे बोली,
"सहनशीलता की सीमा है"

कवि अपनी आँखें खोलकर देखता है सर्व सहय को,
वह उन छिपे संदेशों को पहचानता है।
वचन लिखे, हलचल बनाई,
कल मनुष्यों के लिए चेतावनी छोड़ दी।

सहनशीलता और सतर्कता का पाठ उसने पढ़ाया,
प्रकृति की गंभीरता समझने का रास्ता दिखाया।

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

हृदय के अक्षरों में खोया हुआ" ( ग़ज़ल )

 हृदय के अक्षरों में खोया हुआ" 
( ग़ज़ल )



तुम मौन रहो तो हृदय खिल उठे हैं गुलों सा,
तुम मौन रहो तो हृदय सज उठे हैं गुलों सा.(X2)

साया भी शाम की गलियों में आता है,
प्रेम की आभा मेरे हृदय में बहती है गुलों सा.(X2)

हवा भी नाम लिए बिना बहती है,
सितारे राहों में आँसुओं की चमक बिखेरते हैं गुलों सा.(X2)

चाँदनी रात में खामोशी गाती है,
हर धड़कन में तेरी याद बसती है गुलों सा.(X2)

फूलों की खुशबू भी तुझसे कहती है,
हर सांस में तेरा नाम लहराता है गुलों सा.(X2)

इस मौननंबर में मैं खो गया  तेरे नाम से 
यादों में जी आर कविता बनाकर जी रहा है ,गुलों सा.(X2)

 जी आर कवियुर 
04 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

शीर्षक: सुरक्षा का महत्व

शीर्षक: सुरक्षा का महत्व

स्वयं की सुरक्षा के साथ-साथ  
दूसरों के जीवन भी कीमती हैं।  
काम के हर कदम पर  
सुरक्षा की चेतना सबसे पहले होनी चाहिए।  

जहाँ सफाई और अनुशासन है,  
वहाँ दुर्घटनाएँ दूर रहती हैं।  
जो हाथ नियमों का पालन करते हैं,  
काम वहाँ सुरक्षित होता है।  

निर्माण स्थलों और उद्योग कार्यशालाओं में,  
जब विश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं

जी आर कवियुर 
03 02 2026
( कनाडा, टोरंटो)

Monday, February 2, 2026

फूलों की कोमल खुशबू


फूलों की कोमल खुशबू

कोमल कुसुम प्रेम से खिलते हैं,  
हल्की सुगंध हवा में बिखरती है।  
जीवन के चक्र में बहते हुए,  
प्रकृति अपनी निश्चब्द संगीत गाती है।

मधुमक्खियाँ इकट्ठा होती हैं, चुम्बन लाती हैं,  
इसे नई सृष्टि की लहरों में बदल देती हैं।  
एक दिन के लिए वे फूल के रूप में खिलते हैं,  
फिर भगवान के चरणों पर गिर जाते हैं।

मिट्टी में गिरकर वे विश्राम करती हैं और मिल जाती हैं,  
पुनः सृष्टि रचने के लिए पृथ्वी के साथ जुड़ जाती हैं।  
प्रकृति चुपचाप अपने नियम का पालन करती है,  
प्रकृति और प्रेम मिलकर सृष्टि के उल्लास को आगे बढ़ाते हैं।

गिरी पत्तियों का संगीत

गिरी पत्तियों का संगीत

हवा की थपकों में गिरी पत्तियाँ रोती हैं,  
और हरी पत्तियाँ उन्हें देख मुस्कुराती हैं।  
हर गिरावट एक नया प्रेम जन्म देती है,  
धरा का निश्चब्द गीत साथ में गाता है।

मिट्टी पर तुलसी के फूल की तरह झुकी हुई,  
हर पत्ती दिव्य स्नेह से बहती है।  
बारिश की बूँदें हल्की छूती हैं,  
समय की लय में संगीत प्रवाहित होता है।

गिरी पत्तियाँ चित्रित तितलियों की तरह उड़ती हैं,  
पंख निश्चब्द सौंदर्य में मिल जाते हैं।  
कल गिरी पत्तियाँ आज रहस्यमय लय करती हैं,  
कल सभी को गिरना होगा, प्रकृति के शाश्वत नियम के अनुसार।


जी आर कवियुर 
02 02 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

हवा की याद


हवा की याद

कोहरे की खुशबू, फूलों की सुगंध,  
पुरानी यादें हवा में बह रही हैं।  
समय द्वारा छीने गए प्रियजनों की मौजूदगी,  
पूरा हृदय हवा की क्रूरता से दूर फेंक दिया गया।

बड़ी पत्तियाँ घूमती हैं, वृत्ताकार रास्ते बनाती हैं,  
बिजली की धड़कन हवा में महसूस होती है।  
प्रेम और प्रकृति आपस में मिलकर मजबूत होते हैं,  
यह हवा बिना आवाज़ के अपनी कहानी सुनाती है।

एक पल तेज़ी से गुजर जाता है,  
अचानक का दुःख धीरे से गिरता है।  
केवल हवा की याद ही सांस लेती है,  
हृदय के भीतर सभी रंग हिलने लगते हैं।

जी आर कवियुर 
02 02 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

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तारों भरी गर्मी

तारों भरी गर्मी

तेज धूप की पकड़ से निकल कर, रात की कोमल ठंडक में,  
आकाश स्पष्ट और चमकता है।  
तारे छुपते और चमकते हैं,  
जैसे प्यार में चुम्बन पाकर जल रहे हों।

छवियाँ आँखों में झिलमिलाती हैं,  
एक पल में अनगिनत कथाएँ कहती हैं।  
तारे मिलकर नृत्य करते हैं,  
प्यार की आवाज़ के बिना।

एकांत यात्रा की तरह,  
टूटा हुआ स्नेह गिरता है, जैसे एक दृश्य।  
आकाश की दया में खो गया,  
तारों भरी गर्मी।

जी आर कवियुर 
02 02 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

कोहरे की निस्तब्धता

कोहरे की निस्तब्धता

जहाँ हवा गुजरती है राह में,  
पत्तियाँ अपनी खुशबू छोड़ती हैं।  
रंग चारों ओर जाग उठते हैं,  
निशब्दता में आवाज़ें खो जाती हैं।

पैरों के निशान न दिखने के बावजूद,  
दिशा बदलने का अहसास होता है।  
भोर की सुगंध और कोहरे की ठंडक  
मिलकर हवा में घुलती हैं।

हर साँस एक नई तस्वीर बनाती है,  
हृदय बिना देखे देखता है।  
हर रंग हवा के मार्ग का अनुसरण करता है,  
मन धीरे-धीरे स्वयं आगे बढ़ता है।

जी आर कवियुर 
30 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

धुएँ-सा स्वप्न


धुएँ-सा स्वप्न 

रात के किनारे एक धुँधली मुस्कान,
नींद से पहले की एक झलक।
धुंध में लिपटा हुआ स्वप्न,
मन में धीरे-धीरे हिलता है।

दूर से आती कोई ध्वनि,
बिन शब्दों के पास चली आती है।
एक छुपी हुई चाह जाग उठती है,
मौन को आकार मिलने लगता है।

समय से छुआ हुआ एक स्मरण,
रंग बदले, पर दूर न हुआ।
धुएँ-सा उठता हुआ स्वप्न,
धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन होता है।

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

नदी की उंगलियाँ


नदी की उंगलियाँ

धरती की छाती पर लंबी उंगलियाँ,
पानी द्वारा बनाई गई राहें।
रेतीले किनारों पर उकेरी गति,
निशब्दता को जगा देती है।

लहरें आपस में बात करती हैं,
बिना आवाज़ की भाषा में।
धूप से गरम पत्थरों के बीच,
ठंडक अपना रास्ता ढूँढ लेती है।

नीचे मुड़ती पगडंडियाँ,
दूरी जाने बिना फैलती जाती हैं।
नदी अपनी उंगलियाँ बढ़ाकर,
धरती को कोमलता से छूती है।

जी आर कवियुर 
30 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

पैतृक घर का हृदय

पैतृक घर का हृदय 

मिट्टी की सुगंध दीवारों में ठहरी है,
समय से भूली सीढ़ियाँ मौन खड़ी हैं।
खुले द्वारों ने जो कथाएँ कही थीं,
वे आज भी हवा के साथ चलती हैं।

पुरानी हँसी कोने में छिपी है,
चूल्हे की ऊष्मा स्मृति बन गई है।
जैसे-जैसे परछाइयाँ लंबी होती हैं,
साँझ शांति से आ बैठती है।

पीढ़ियाँ भले ही दूर चली गई हों,
रिश्ते यहाँ फीके नहीं पड़ते।
तरा-तरा करता वह घर का हृदय
आज भी साँस लेता रहता है।

जी आर कवियुर 
30 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

नज़र की मुहर

नज़र की मुहर 

एक दृष्टि राह में ठहर जाती है,
बिना कहे एक कथा कह जाती है।
जहाँ शब्द पहुँच नहीं पाते,
वहाँ आँखें अर्थ बिखेर देती हैं।

पल भले ही धुँधले हो जाएँ,
वह दृश्य नहीं बदलता।
प्रकाश और अंधकार के बीच,
एक निशान स्थिर रहता है।

समय आगे बढ़ता रहता है,
स्मृति पीछे से बुलाती है।
आँखों में अंकित वह मुहर
केवल हृदय में सँजोई जाती है।

जी आर कवियुर 
30 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)


प्रभात की चमक

प्रभात की चमक

भोर की साँस धीरे-धीरे बिखरती है,
अँधेरा चुपचाप पीछे हटता है।
आकाश नई ताज़गी से खिल उठता है,
रंग मौन में एक-दूसरे से मिलते हैं।

पक्षियों की फड़फड़ाहट ऊँची होती है,
दिन की शुरुआत लिख दी जाती है।
बिना ताप वाली रोशनी
चेहरे पर कोमलता से उतरती है।

रात का भार उतर जाता है,
मन जागकर स्थिर हो जाता है।
एक नया क्षण पास आता है,
आगे केवल प्रकाश चमकता है।

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

छाया का स्पर्श


छाया का स्पर्श 

सांझ की गलियों में एक साँस बहती है,
छिपी हुई रोशनी राह के किनारे ठहर जाती है।
आँखों से न दिखने वाली उपस्थिति,
केवल हृदय पहचानता है।

हवा में बहती निस्तब्धता
कदमों पर धीरे से टिक जाती है।
कहीं दूर कोई स्मृति हिलती है,
मौन होकर मन की ओर बढ़ती है।

एक पुराना क्षण लौट आता है,
समय बदला है, पर उसकी गंध बची है।
अंधेरे में बिना भय के,
स्पर्श ही मार्गदर्शक बनता है।

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

स्वप्नों की नदी

स्वप्नों की नदी 

स्वप्नों की नदी में बहते हुए,
मौन के किनारों पर लहरों की तरह,
स्मृतियों के रंगों में डूबते-उतराते क्षणों में,
आँसू और मुस्कान एक साथ मिल जाते हैं।

नदी का ठंडा स्पर्श हृदय को छूता है,
धुंध की परतों में प्रकाश छुप-छुपकर झलकता है,
प्रतिबिंब आँखों को मुस्कान लौटाते हैं,
एक कोमल सा संगीत बहकर आता है।

स्मृतियाँ वर्षा-बूँदों की तरह गिरती हैं,
बड़े स्वप्न छोटी झीलों में तैरते हैं,
चाँद आकर धीरे से मुस्कुराता है,
धारा की विपरीत हवा में ठहर जाता है।

हृदय के किनारों को खोजते हुए,
स्वप्नों की नदी आकर आलिंगन करती है।

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

प्रकृति का संदेश(ग़ज़ल )

 प्रकृति का संदेश(ग़ज़ल )
 
पेड़ों की छाँव में छुपा है शांति का संदेश,
हवा भी गाती है सदा ये शांति का संदेश।

नदियों की लहरों में बहता है प्रेम,
सूरज की किरणें भी देती हैं ये प्रेम का संदेश।

फूलों की खुशबू फैलाती है अच्छाई,
बरसात की बूंदें देती हैं जीवन का संदेश।

पत्तों की सरसराहट में छुपा है जीवन,
पंछियों की चहचहाहट देती है जीवन का संदेश।

धरती ने सिखाया संतुलन का पाठ,
आकाश ने दिया आशा का संदेश सदा।

मानव ने सीखा सबक प्रकृति से खुदा,
जी आर कहे — यही है मानवता का संदेश।

जी आर कवियुर 
03 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

याद तेरी सताती है” (ग़ज़ल)

 याद तेरी सताती है” (ग़ज़ल)




टूटे हुए आईने को देखता तो याद तेरी सताती है  
हर टूटते हुए टुकड़े में बस तेरी बात ही आती है  

सन्नाटों में तेरा नाम बुलाता तो याद तेरी सताती है  
राहों में खोए हुए कदम फिर तेरी राह पाती है  

चांदनी रात में तन्हा बैठता तो याद तेरी सताती है  
हर चमकती हुई किरण में बस तू ही दिखाई देती है  

दिल के दरारों में उम्मीदें भी तन्हा रह जाती हैं  
हर दर्द के साथ तेरी याद फिर सताती है  

हवा के झोंकों में तेरी खुशबू महसूस करता हूँ  
तेरी सांस की गूंज जब आती है, याद तेरी सताती है  

बीती हुई बातों में खो जाता तो याद तेरी सताती है  
हर हँसी, हर जुदाई, अब बस तेरी राह दिखाती है  

सफर में हर मोड़ पर तेरा अक्स नजर आता है  
हर थमी हुई धड़कन में याद तेरी सताती है  

तन्हाई के मौसम में तेरी यादों का मौसम है  
हर सूनी गली में तेरी हँसी फिर सताती है  

आँखों के आँसुओं में भी तेरी छवि बसी रहती है  
हर गिरते पल में तेरी याद फिर सताती है  

ख्वाबों की दुनिया में भी तेरी ही छवि दिखती है  
हर नींद टूटते ही याद तेरी सताती है  

रात की तन्हाई में तेरी बातें फिर गुनगुनाता हूँ  
हर सन्नाटा सुनहरा याद तेरी सताती है  

अब अपने ही नाम को पुकारता हूँ तन्हा  
जी आर को हर पल तेरी याद फिर सताती है

जी आर कवियुर 
02 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अकेले विचार – 133

 अकेले विचार – 133

अदृश्य उम्मीद दिल के भीतर जगमगाती है  
घने अंधेरे में एक छोटी सी दीपक उठती है  
गिरे हुए पलों से सबक बनते हैं  
गिरे हुए आँसुओं से शक्ति मिलती है  

बंद दरवाज़े नए रास्ते दिखाते हैं  
विनाश से साहस उभरता है  
विश्वास हाथ पकड़ कर आगे बढ़ाता है  
विफलता कला में बदल जाती है  

साँसों के साथ सपने यात्रा करते हैं  
भविष्य का डर धीरे-धीरे मिटता है  
सहनशीलता समय के साथ सोना बनती है  
जीवन याद दिलाता है कि अच्छाई हमेशा बढ़ती है


जी आर कवियुर 
02 02 2026 
( कनाडा, टोरंटो)