ख़ामोशी की चोट (ग़ज़ल)
रात के रेगिस्तान में, खामोशी भी सोने लगी है
दुनिया के शोर में, खुद की राह खोने लगी है
दुःख के ठंडे रास्तों पर, उम्मीदें हिलने लगी हैं
नन्ही सी चुभनें भी, बड़े दिल को छूने लगी हैं
जो ऊँचाइयों पर बैठे, शोर में खोए रहे हैं
नीचे की सरगोशियाँ, सबसे भारी भी लगी हैं
चिट्ठी और हाथी की कहानी, सच में मिलती है
छोटी चुभनें भी, कभी सबसे बड़ी होती हैं
मौन में छिपे हुए सबक, कभी जोर से बोलते हैं
अनकहे अनुभव भी, सबसे गहरे उतरते हैं
जी आर, एक ही मुलाक़ात ने ये समझा दिया है
ख़ामोशी की चोट सबसे भारी भी है
जी आर कवियुर
09 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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