मिट्टी की सुगंध दीवारों में ठहरी है,
समय से भूली सीढ़ियाँ मौन खड़ी हैं।
खुले द्वारों ने जो कथाएँ कही थीं,
वे आज भी हवा के साथ चलती हैं।
पुरानी हँसी कोने में छिपी है,
चूल्हे की ऊष्मा स्मृति बन गई है।
जैसे-जैसे परछाइयाँ लंबी होती हैं,
साँझ शांति से आ बैठती है।
पीढ़ियाँ भले ही दूर चली गई हों,
रिश्ते यहाँ फीके नहीं पड़ते।
तरा-तरा करता वह घर का हृदय
आज भी साँस लेता रहता है।
जी आर कवियुर
30 01 2026
( कनाडा, टोरंटो)
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