स्वप्नों की नदी में बहते हुए,
मौन के किनारों पर लहरों की तरह,
स्मृतियों के रंगों में डूबते-उतराते क्षणों में,
आँसू और मुस्कान एक साथ मिल जाते हैं।
नदी का ठंडा स्पर्श हृदय को छूता है,
धुंध की परतों में प्रकाश छुप-छुपकर झलकता है,
प्रतिबिंब आँखों को मुस्कान लौटाते हैं,
एक कोमल सा संगीत बहकर आता है।
स्मृतियाँ वर्षा-बूँदों की तरह गिरती हैं,
बड़े स्वप्न छोटी झीलों में तैरते हैं,
चाँद आकर धीरे से मुस्कुराता है,
धारा की विपरीत हवा में ठहर जाता है।
हृदय के किनारों को खोजते हुए,
स्वप्नों की नदी आकर आलिंगन करती है।
जी आर कवियुर
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)
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