“तन्हाई का सितम (ग़ज़ल )
और ये सितम अब और सहा जाए नहीं
तन्हाई इस क़दर है कि जिया जाए नहीं
टूट चुका हूँ मैं कई ख़्वाबों के बाद
अब किसी वादे पे यक़ीं किया जाए नहीं
महफ़िलों में भी सुकूँ ढूँढता फिरता हूँ
ये दर्द-ए-दिल किसी से कहा जाए नहीं
कलम और काग़ज़ की इबादत है बस
और कोई दूसरा सहारा जाए नहीं
हर रात बिखरता हूँ मैं यादों में यूँ
सुबह होने तक खुद को समेटा जाए नहीं
ग़म ने सिखाया है जी आर को लिखना तन्हा दिलसे
वरना इस हाल में ग़ज़ल कहा जाए नहीं
जी आर कवियुर
08 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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