Friday, February 6, 2026

अंजान रही है ( ग़ज़ल )

 अंजान रही है
 ( ग़ज़ल )




तुझको पता न था कि मेरी हालत क्या रही है
मेरी हर एक ख़ामोशी, तुझसे ही कहती रही है

नींदों में भी जागती आँखों की कहानी
हर एक धड़कन में, तेरी ही कमी रही है

शब्दों में छुपा दर्द, तू पढ़ न सका कभी
मेरी हर एक लिखावट, तुझसे ही बनती रही है

तेरे बिना भी जीना, मैंने सीख लिया मगर
हर मोड़ पर ये रूह, तुझसे ही लड़ती रही है

वक़्त ने सिखाया बहुत, सहना भी मुस्काना
फिर भी किसी मोड़ पर, आँखें नम होती रही है

जी आर कहे, तेरा प्यार मुझे मिला नहीं
फिर भी मेरी हर साँस में, तेरी ही गर्मी रही है

जी आर कवियुर 
05 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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