एक शब्द जिसका अर्थ खो गया
Picture made by Google Gemini
रोज़मर्रा के छोटे-छोटे क्षणों में,
तनाव और शांति के बीच,
बिना सोच-समझ के निकल जाता है,
सिर्फ आम शब्द बहते चले जाते हैं।
रिश्तों में और सत्ता के सामने,
यह आदत बनकर बार-बार गिरता है।
संस्कार के नाम पर सिखाया गया,
एक गहराई खो चुका शब्द।
पहाड़ देखते रहते हैं, नदियाँ चुपचाप बहती हैं,
घायल मिट्टी कुछ नहीं कहती,
सब कुछ देने वाली धरती अंततः मौन रहकर
“संहार रुद्रीनी” में बदल जाती है।
जब साँस लेना मुश्किल हो जाएगा,
और सब कुछ राख में बदल जाएगा,
“सॉरी अथवा क्षम करें” आखिर में इंसान कहेगा,
एक खाली शब्द, जिसका अर्थ खो गया।
जी आर कवियुर
02 02 2026
( कनाडा, टोरंटो)

No comments:
Post a Comment