चाँद सितारों के पार
चाहे जितनी आँख मिचौली खेलो ऐ यार, आ गया हूँ
तुझे ढूँढते ढूँढते चाँद सितारों के पार आ गया हूँ
तू बादलों में छिपा रहा हर बार
तेरी चाह में धरती से आकाश के पार आ गया हूँ
तू समझा कोई पहुँच न पाए उस द्वार
हर बंद रास्ते तोड़कर तेरे द्वार आ गया हूँ
तेरी हँसी की खुशबू रही मेरे साथ हर बार
उसी महक के सहारे तेरे घर के पार आ गया हूँ
तेरी आँखों में बसा है मेरा सारा संसार
उन्हीं नजरों की चमक में खुद को वार आ गया हूँ
तेरे बिना सूना था जीवन का हर त्योहार
तेरी एक मुस्कान से फिर बहार आ गया हूँ
अब कहाँ छिपेगा मुझसे ऐ प्यार
तेरी एक पुकार पर हर दीवार के पार आ गया हूँ
जी आर भटका बहुत इस जग के संसार
तेरी सच्ची मोहब्बत से खुद के पार आ गया हूँ
जी आर कवियुर
16 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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