यादों का समंदर (ग़ज़ल)
अपना ही नाम जैसे वो भूल जाता है,
आँखों में अश्क लेकर वो मुस्कुराता है।
अपनी ही अहल-ए-वफ़ा का वो चेहरा देख कर,
पहचानता है कभी, कभी भूल जाता है।
गुज़रे हुए दिनों की कोई याद तक नहीं,
वक़्त का हर पन्ना हवा में उड़ जाता है।
अख़बार की पहेली को भरने का वो शौक़,
अब मौन रास्तों पे उसे छोड़ आता है।
दोस्त और हमसफ़र जो उसे याद आएँ भी,
इक पल में सारा नक़्शा ही बदल जाता है।
कल तुम भी इस भँवर में कहीं फँस न जाओ तुम,
किस्मत का ये समंदर सबको डराता है।
ये ज़िंदगी जीने का कोई और ढंग नहीं,
बस इक मर्ज़ है जो यादें चुराता है।
ग़ैर नहीं 'जीआर' ये खामोशी का सफ़र,
इंसान अपनी हस्ती से ही हार जाता है।
रचना: जी आर कवियूर
16.02.2026
(कनाडा, टोरंटो)
No comments:
Post a Comment