धुएँ-सा स्वप्न
रात के किनारे एक धुँधली मुस्कान,
नींद से पहले की एक झलक।
धुंध में लिपटा हुआ स्वप्न,
मन में धीरे-धीरे हिलता है।
दूर से आती कोई ध्वनि,
बिन शब्दों के पास चली आती है।
एक छुपी हुई चाह जाग उठती है,
मौन को आकार मिलने लगता है।
समय से छुआ हुआ एक स्मरण,
रंग बदले, पर दूर न हुआ।
धुएँ-सा उठता हुआ स्वप्न,
धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन होता है।
जी आर कवियुर
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)
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