आँसुओं की डगर पर (ग़ज़ल)©
आँसुओं की डगर पर, चोट खाता रहा मैं इश्क पर
जिंदगी के हर दाव पर, बिगोता रहा इश्क पर
हर ख्वाब मेरा टूटा, टूटता रहा मैं इश्क पर
हर धड़कन में ढूँढता, अपना तूफ़ान इश्क पर
रातों की तन्हाई में, रोता रहा मैं इश्क पर
चाँद की चुप्प में गुम, खोता रहा मैं इश्क पर
बेवफ़ा का जाल था, फँसता रहा मैं इश्क पर
उम्मीद की लौ जलती, बुझता रहा मैं इश्क पर
सपनों के उस पार भी, ढूँढता रहा मैं इश्क पर
हकीकत की कसक में, घिरता रहा मैं इश्क पर
जी आर की दास्ताँ यही, बयां करता रहा मैं इश्क पर
हर साँस में ज़िंदा रहा, अपना जहां इश्क पर
जी आर कवियुर
05 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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