भूल जाने की खामोशी
वह जो अपना नाम तक भूल गया
वह जो आँसुओं के साथ देखता है
अपनी प्यारी पत्नी का चेहरा
जानता या भूल जाता है, यूँ ही गुजरता है
समय और दिन धीरे-धीरे खो गए
एक भी याद बची नहीं किसी दिन की
साथी और दोस्त भी
पूछें तो वह भूल जाता है
अख़बार आने पर सबसे पहले
शब्द पहेली को भरता और खेलता
समय बीत जाता है, और वह जान नहीं पाता
मौन दिनों का सफ़र चलता रहता है
जी आर कवियुर
16 02 2026
(कनाडा , टोरंटो)
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