चट्टानों में यादें
चट्टानों की मौनता निस्सहाय कथाएँ कहती है,
समय के स्पर्श में यादें खिलती हैं।
पीटर, तुम एक चट्टान बन जाते हो, हृदय में अडिग खड़े,
जीवन की कठिनाइयाँ और शांति मिलकर एक हो जाती हैं।
पत्थरों के बीच गिरे फूल,
जीवन की बाहरी झलकियाँ प्रकट करते हैं।
जैसे स्वामी विवेकानंद ने कन्याकुमारी की चट्टान पर अपने राष्ट्र का दर्शन पाया,
भारत का विशाल रूप मन में उद्घाटित होता है।
मधुरता, दुःख और आनंद सब सुरक्षित हैं,
चट्टानों में यादें मौन रूप में जीवित रहती हैं।
आत्मा की स्पंदनाएँ हृदय में प्रतिध्वनित होती हैं,
यादें समय की धारा में यात्रा करती हैं।
जी आर कवियुर
21 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)
No comments:
Post a Comment