“बोलना तो चाहता था” ( ग़ज़ल)
बोलना तो चाहता था, मगर कह न सका
आज यादों में तुझे फिर भी भुला न सका
दिल में अरमान कई पलते रहे चुपके से
सामने तू जो आया तो जता न सका
तेरी आँखों में जो ठहरा था उजाला कभी
उस उजाले को मैं दिल से मिटा न सका
वक़्त ने लाख सिखाया कि संभल जाऊँ मैं
तेरे जाने का मगर ग़म भुला न सका
रात तन्हाई की चुपचाप गुजरती ही रही
तेरा चेहरा मेरी नींदों से हटा न सका
अपने जज़्बात को अल्फ़ाज़ में ढालूँ कैसे
दिल की धड़कन को भी लब तक ला न सका
लोग कहते रहे आगे भी तो दुनिया है बहुत
मैं तेरी याद से रिश्ता तोड़ पा न सका
एक तस्वीर थी आँखों में बसी बरसों से
उसको चाहा भी तो दिल से गिरा न सका
साँस चलती रही लेकिन वो सुकूँ ना मिला
ज़ख़्म सीने का किसी से भी बता न सका
भीड़ में रह के भी तन्हा ही रहा हूँ हरदम
अपने अंदर का सन्नाटा सजा न सका
'जी आर' दिल की कहानी ही लिखता रहा
अपना ही हाल किसी को सुना न सका
जी आर कवियुर
14 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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