छाया का स्पर्श
सांझ की गलियों में एक साँस बहती है,
छिपी हुई रोशनी राह के किनारे ठहर जाती है।
आँखों से न दिखने वाली उपस्थिति,
केवल हृदय पहचानता है।
हवा में बहती निस्तब्धता
कदमों पर धीरे से टिक जाती है।
कहीं दूर कोई स्मृति हिलती है,
मौन होकर मन की ओर बढ़ती है।
एक पुराना क्षण लौट आता है,
समय बदला है, पर उसकी गंध बची है।
अंधेरे में बिना भय के,
स्पर्श ही मार्गदर्शक बनता है।
जी आर कवियुर
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)
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