विरह की बहारें (ग़ज़ल)
कितने ही वसंत गुज़र गई,
दिल से तेरी तस्वीर गुज़र गई।
दिन-रात यूँ ही ख़ामोश रहे हम,
और हर एक तदबीर गुज़र गई।
मौन में तुझे ढूँढता रहा दिल,
बिना जाने हर तक़दीर गुज़र गई।
विरह की आग सीने में जलती रही,
मीठी सी हर पीर गुज़र गई।
आँखों में ठहरे हुए आँसू बह निकले,
दिल की हर तासीर गुज़र गई।
सूक्ष्म सी यादों में जी रहा हूँ अब भी,
जी आर की ये तहरीर गुज़र गई।
जी आर कवियुर
11 02 2026
( कनाडा, टोरंटो)

No comments:
Post a Comment