अतिजीवन
पिघलती गर्मी में, मैं छाया की तरह खड़ा रहा,
लुप्त ज्वाला में, मेरी आँखें नम न हुईं;
जब हृदय के रक्त से महल बनाया गया,
तुमने पत्थर फेंके, मेरी उपहासा करते हुए।
घायल पक्षी गाता है अकेले गीत,
दूसरों के कानों में अमृत बन जाता है;
शाप की रेखाओं को प्रेम से मिटाता है,
मेरे अडिग कलम की विजय यात्रा।
दूरस्थ भूमि में खिलता है सम्मान,
ज्ञान की चमक मेरे सीने में फैलती है;
पंख काटने वाले झाड़ियों के बीच,
मेरी कल्पनाशील कविता आकाश तक ऊँची उठती है।
जी. आर. कवियूर
09 02 2026
(टोरंटो, कनाडा)

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