फोटोग्राफर
कितनी अनकही पीड़ा के साथ
वे चलते हैं —
कैमरे की खुली आँख लिए,
मंचों और त्योहारों के पार,
जन्म और मृत्यु के बीच,
शादियों और रस्मों के मध्य —
चुपचाप सब कुछ पार करते हुए।
प्रकृति की कठोर विकृतियाँ भी
वे सह लेते हैं,
कल की स्मृतियाँ
दुनिया को सौंपते हुए।
हम उनके दर्द को नहीं जानते,
बस उनकी मुस्कान देखते हैं।
एक माप भूख के लिए,
जीवन की निरंतरता के लिए,
वे आगे बढ़ते रहते हैं।
जो जीवन का सम्पूर्ण भार
अपने सीने पर उठाए चलते हैं,
उनके लिए
थोड़ा-सा मौन रखना —
यही मेरा विश्वास है।
जी आर कवियुर
20 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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