Monday, February 2, 2026

नज़र की मुहर

नज़र की मुहर 

एक दृष्टि राह में ठहर जाती है,
बिना कहे एक कथा कह जाती है।
जहाँ शब्द पहुँच नहीं पाते,
वहाँ आँखें अर्थ बिखेर देती हैं।

पल भले ही धुँधले हो जाएँ,
वह दृश्य नहीं बदलता।
प्रकाश और अंधकार के बीच,
एक निशान स्थिर रहता है।

समय आगे बढ़ता रहता है,
स्मृति पीछे से बुलाती है।
आँखों में अंकित वह मुहर
केवल हृदय में सँजोई जाती है।

जी आर कवियुर 
30 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)


No comments:

Post a Comment