Monday, February 2, 2026

प्रभात की चमक

प्रभात की चमक

भोर की साँस धीरे-धीरे बिखरती है,
अँधेरा चुपचाप पीछे हटता है।
आकाश नई ताज़गी से खिल उठता है,
रंग मौन में एक-दूसरे से मिलते हैं।

पक्षियों की फड़फड़ाहट ऊँची होती है,
दिन की शुरुआत लिख दी जाती है।
बिना ताप वाली रोशनी
चेहरे पर कोमलता से उतरती है।

रात का भार उतर जाता है,
मन जागकर स्थिर हो जाता है।
एक नया क्षण पास आता है,
आगे केवल प्रकाश चमकता है।

जी आर कवियुर 
29 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)

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