Thursday, February 19, 2026

बादलों की छाया

 बादलों की छाया

सफ़ेद बादल आकाश में फैलते हैं,  
हवा की मौजूदगी उंगलियों की तरह बहती है।  
छायाओं की कोमलता में आँखें खिलती हैं,  
हृदय आकाश की ओर उठता है।  

नदी की सतह पर प्रतिबिंब चमकते हैं,  
बरसात की बूँदें मन में कविताएँ गुनगुनाती हैं।  
गर्मी का समय छुपकर मूक हो जाता है,  
पक्षियों के गीत गलियों में बहते हैं।  

प्रकृति की धुनें हृदय को छूती हैं,  
रंग बादलों के बीच से गुजरते हैं।  
स्मृतियों की छाया फिर से जागती है,  
बादलों की छाया हृदय में मुस्कुराती है।

जी आर कवियुर 
19 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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