Saturday, February 21, 2026

चट्टानों में यादें

 चट्टानों में यादें

चट्टानों की मौनता निस्सहाय कथाएँ कहती है,  
समय के स्पर्श में यादें खिलती हैं।  
पीटर, तुम एक चट्टान बन जाते हो, हृदय में अडिग खड़े,  
जीवन की कठिनाइयाँ और शांति मिलकर एक हो जाती हैं।  

पत्थरों के बीच गिरे फूल,  
जीवन की बाहरी झलकियाँ प्रकट करते हैं।  
जैसे स्वामी विवेकानंद ने कन्याकुमारी की चट्टान पर अपने राष्ट्र का दर्शन पाया,
भारत का विशाल रूप मन में उद्घाटित होता है।

मधुरता, दुःख और आनंद सब सुरक्षित हैं,  
चट्टानों में यादें मौन रूप में जीवित रहती हैं।  
आत्मा की स्पंदनाएँ हृदय में प्रतिध्वनित होती हैं,  
यादें समय की धारा में यात्रा करती हैं।

जी आर कवियुर 
21 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

पयार का सफर ( सूफी ग़ज़ल )

 पयार का सफर ( सूफी ग़ज़ल )




हर पल तेरी यादों में खोया,  
दिल मेरा तेरी रहमत में खोया।  

मयख़ाने की खुशबू में बहकता,  
रूह मेरी तेरे साये में खोया।  

दरवेश की बातें सुनते-सुनते,  
हर जज़्बात तेरी मौज में खोया।  

चाँदनी रात में जब तेरा नाम लिया,  
हर सवेरा तेरी रोशनी में खोया।  

साक़ी की प्याली में ढूँढा सुकून,  
हर पल मेरा तेरी मेहरबानी में खोया।  

माया के इस संसार में तुझको पाया,  
हर दिल मेरा तेरे इश्क़ में खोया।  

जी आर की दुआ है ये दिल सदा महकता रहे,  
तेरे रहमत और इश्क़ की गहराई में खोया।

जी आर कवियुर 
21 02 2026
( कनाडा, टोरंटो)

फोटोग्राफर

 फोटोग्राफर


कितनी अनकही पीड़ा के साथ
वे चलते हैं —
कैमरे की खुली आँख लिए,
मंचों और त्योहारों के पार,
जन्म और मृत्यु के बीच,
शादियों और रस्मों के मध्य —
चुपचाप सब कुछ पार करते हुए।

प्रकृति की कठोर विकृतियाँ भी
वे सह लेते हैं,
कल की स्मृतियाँ
दुनिया को सौंपते हुए।

हम उनके दर्द को नहीं जानते,
बस उनकी मुस्कान देखते हैं।
एक माप भूख के लिए,
जीवन की निरंतरता के लिए,
वे आगे बढ़ते रहते हैं।

जो जीवन का सम्पूर्ण भार
अपने सीने पर उठाए चलते हैं,
उनके लिए
थोड़ा-सा मौन रखना —
यही मेरा विश्वास है।

 जी आर कवियुर 
20 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)





Thursday, February 19, 2026

बादलों की छाया

 बादलों की छाया

सफ़ेद बादल आकाश में फैलते हैं,  
हवा की मौजूदगी उंगलियों की तरह बहती है।  
छायाओं की कोमलता में आँखें खिलती हैं,  
हृदय आकाश की ओर उठता है।  

नदी की सतह पर प्रतिबिंब चमकते हैं,  
बरसात की बूँदें मन में कविताएँ गुनगुनाती हैं।  
गर्मी का समय छुपकर मूक हो जाता है,  
पक्षियों के गीत गलियों में बहते हैं।  

प्रकृति की धुनें हृदय को छूती हैं,  
रंग बादलों के बीच से गुजरते हैं।  
स्मृतियों की छाया फिर से जागती है,  
बादलों की छाया हृदय में मुस्कुराती है।

जी आर कवियुर 
19 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)

अभी भी चढ़ना बाकी है (कवि और सिविल इंजीनियर के रूप में)

 
अभी भी चढ़ना बाकी है
(कवि और सिविल इंजीनियर के रूप में)




अब भी मैं एक विद्यार्थी हूँ —
धैर्य से रेखाएँ खींचता हूँ,
विनम्रता से सुधार करता हूँ,
अविस्मरणीय सपने रचता हूँ।

सिविल इंजीनियरिंग ने मेरे हाथ बनाए,
कविता ने मेरे हृदय को आकार दिया।

कल्पना — मेरी सच्ची इंजीनियरिंग है।
कविता — मेरी चढ़ाई का पेड़,
और मेरी प्यारी चाय की प्याली।

मैंने बहुत दूर की यात्रा की है,
फिर भी रास्ता आगे फैला हुआ है।

अभी भी पुल बनाने हैं,
कविताओं को जीवन देना है।

अनुभव मेरे साथ खड़ा है,
लेकिन जिज्ञासा आगे बढ़ती है।

जी आर कवियुर 
19 02 2026
(कनाडा, टोरंटो)





Wednesday, February 18, 2026

यादों के आसमाँ में

 यादों के आसमाँ में


इस क़दर टूट चुके हैं हम तेरी याद में,

तेरी वफ़ा माँगते हैं हम भी तेरे सहारे में।


दिल को सुकूँ मिलता नहीं इस बेकरार रात में,

खोए से फिरते हैं हम तेरे ही ख़्वाब में।


तन्हाई के बादल छा गए दिल के आसमाँ में,

भीगते रहते हैं अरमाँ तेरे इंतज़ार में।


हर धड़कन पुकारे तेरा नाम ख़ामोशी में,

डूबते जाते हैं लम्हे तेरे एहसास में।


दुनिया ने भुला दिया हमें अपने हिसाब में,

हम आज भी ज़िंदा हैं तेरे ही ख़याल में।


रात भर जागते रहे तेरी ही चाहत में,

चाँद भी डूबता रहा मेरी निगाह में।


टूट कर चाहा तुझे हमने हर हाल में,

खुद को ही खो दिया तेरे ऐतबार में।


आँखों से गिर पड़े जो अश्क़ ख़ामोशी में,

डूबते रहे वो भी तेरे ही ख़याल में।


ज़ख़्म दिल के भर सके ना उम्र भर में,

बस दर्द ही मिलता रहा हर इम्तिहान में।


छोड़ कर भी तू गया तो क्या गया मुझसे,

साँसें अटकी रह गई तेरे ही नाम में।


तन्हाई के बादल छा गए दिल के आसमाँ में,

‘जी.आर.’ अब भी जी रहा है तेरी यादों में।



जी आर कवियुर 

16 02 2026

(कनाडा, टोरंटो)

भूल जाने की खामोशी

 भूल जाने की खामोशी

वह जो अपना नाम तक भूल गया
वह जो आँसुओं के साथ देखता है
अपनी प्यारी पत्नी का चेहरा
जानता या भूल जाता है, यूँ ही गुजरता है

समय और दिन धीरे-धीरे खो गए
एक भी याद बची नहीं किसी दिन की
साथी और दोस्त भी
पूछें तो वह भूल जाता है

अख़बार आने पर सबसे पहले
शब्द पहेली को भरता और खेलता
समय बीत जाता है, और वह जान नहीं पाता
मौन दिनों का सफ़र चलता रहता है

जी आर कवियुर 
16 02 2026
(कनाडा , टोरंटो)