Thursday, October 1, 2026

धूल जमे सपनों का कमरा

धूल जमे सपनों का कमरा

बंद पड़े एक दरवाज़े के भीतर
धूप भी आने से ठहर गई थी,
खिड़की की महीन-सी दरार से
बस एक किरण भीतर उतरी थी।

दीवार से लगी पुरानी अलमारी में
पीले पड़ चुके पन्ने थे,
अनछुई इच्छाओं के ऊपर
समय की उँगलियों के निशान थे।

कभी आकाश रचने वाला
एक चित्रफलक नीचे पड़ा था,
अधूरी रह गई यात्रा का
नक्शा तह करके रखा था।

धूल की महीन परत के नीचे
एक छोटी-सी मुस्कान चमकी,
उसी पल समझ में आया—
मरा सपना नहीं था,
बस उसे जगाने वाली आवाज़ खो गई थी।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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