समय जिस राह से गुज़र गया,
उस पर कदमों के निशान मिट गए,
पर हृदय में अंकित एक एहसास
बारिश भी धो न सकी।
वर्षों ने रंग भले फीके कर दिए,
एक चेहरा अब भी साफ़ है,
पुराने गीत की किसी धुन में
एक पूरा दौर फिर जाग उठता है।
हवा में बिखरे वे ख़त
भले अपना पता भूल गए,
उनमें बसी स्नेह की गर्माहट
उँगलियों पर आज भी ठहरी है।
जीवन ने राह बदल ली फिर भी
वह स्पर्श कभी नहीं बदला,
दूरियाँ चाहे बढ़ती गईं,
रिश्ते का धागा नहीं टूटा।
अंततः समझ में आया—
समय देह का रूप बदल सकता है,
पर उस पल को कोई युग नहीं मिटा सकता
जिसने सच में आत्मा को छुआ हो।
जी आर कवियुर
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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