Tuesday, October 6, 2026

कल की दस्तख़त

कल की दस्तख़त

बीते कल के घावों को गिनते हुए नहीं,
आज की दहलीज़ पार करनी है;
बीते समय की राख से ही
एक नया सपना गढ़ना है।

भविष्य कोई लिखी हुई तक़दीर नहीं,
हर कदम पर लिया गया फैसला है;
हाथ में कलम न हो फिर भी जीवन
हर पल अपनी एक पंक्ति लिखता है।

भटकी हुई राहें भी व्यर्थ नहीं थीं,
उन्होंने भी कोई दिशा दिखाई;
जिन पलों को हमने हार समझा था,
उन्होंने ही जीत की नींव बनाई।

इसलिए कल के आने का इंतज़ार मत करो,
उसकी पहली पंक्ति आज ही लिख दो;
जब समय पूछे—तुम कौन थे?
तुम्हारा जीवन ही तुम्हारी दस्तख़त हो।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

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