Thursday, October 1, 2026

एक पेड़ की छाँव

एक पेड़ की छाँव

राह किनारे अकेला एक पेड़,
धूप का सारा ताप सहता रहा,
राहगीरों के लिए चुपचाप
ठंडी-सी जगह बनाता रहा।

उसकी डालों पर पंछियों ने
कुछ पल के घरौंदे बनाए,
उड़कर दूर चले जाने पर भी
पंखों की सरसराहट छोड़ गए।

जब कोई थका हुआ पथिक आया,
उसने बिना पूछे अपना लिया;
नाम न जाना, देश न जाना,
फिर भी पत्तों ने सुकून दिया।

बरसात में बूँदों का भार उठाया,
गर्मी में तपन को सहता रहा,
अपनी थकान कभी न कहकर
जीवन भर छाँव देता रहा।

तब जाकर समझ में आया—
अकेले खड़ा होना तन्हाई नहीं;
अपनी तपिश भूलकर
किसी और के लिए शीतल बन जाना ही
जीवन को एक छाँव बनाता है।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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